Oral Medicine for Doctors · 11 min read · हिन्दी
होंठ का अल्सर ठीक नहीं हो रहा तो धूप से नुकसान और कैंसर की जांच कैसे करें?
लगातार बने होंठ के अल्सर को सिर्फ देखकर भरोसे से नहीं बताया जा सकता कि वह एक्टिनिक काइलाइटिस है या कैंसर। एक्टिनिक काइलाइटिस धूप से लंबे समय में हुआ नुकसान है, जिसमें कैंसर बनने की संभावना होती है। यह आमतौर पर निचले होंठ पर होता है। दो हफ्ते से ज्यादा बना अल्सर, सख्ती, बढ़ती गांठ, खून आना या सुन्नपन होने पर सामने से चेकअप जरूरी है। शक होने पर जल्द बायोप्सी, यानी टिशू का छोटा सैंपल लेकर जांच, या स्पेशलिस्ट को रेफर करना चाहिए।
Written and medically reviewed by
Dr. Bipin R. Upadhyay
BDS · MDS Oral Medicine & Radiology · PhD Scholar · Associate Professor & Head, Department of Dentistry
Last clinically reviewed: 2026-11-02
Key points
- धूप से हुए बदलाव और गहराई में फैलने वाला कैंसर साथ हो सकते हैं। किसी एक जगह की असामान्यता को पूरे प्रभावित होंठ से अलग जांचें।
- दो हफ्ते से ज्यादा न भरने वाले अल्सर की सामने से जांच जरूरी है। संदिग्ध संकेत हों तो इंतजार किए बिना रेफर करें।
- घाव की सही जगह, सख्ती, संवेदना, पूरे मुंह की जांच और आसपास के लिम्फ नोड का रिकॉर्ड रखें।
- बायोप्सी से टिशू का डायग्नोसिस मिलता है। स्कैन फैलाव और स्टेजिंग से जुड़े चुने हुए सवालों के लिए होते हैं।
- रेफरल पूरा हुआ या नहीं, इसका फॉलो-अप करें। बायोप्सी रिपोर्ट में चिंता न दिखे, फिर भी जांच में शक बना हो तो दोनों का मेल जांचना जरूरी है।
एक्टिनिक काइलाइटिस और होंठ के कैंसर में क्या फर्क है?
एक्टिनिक काइलाइटिस धूप की अल्ट्रावायलेट किरणों से लंबे समय में हुआ नुकसान है। यह वर्मिलियन को प्रभावित करता है, यानी चेहरे की त्वचा और होंठ के अंदर की परत के बीच का रंगीन हिस्सा। आमतौर पर निचला होंठ प्रभावित होता है। सूखापन, पपड़ी उतरना, परत का पतला होना, जगह-जगह लाल या सफेद बदलाव और होंठ व त्वचा के बीच की साफ सीमा मिटना इसके संकेत हैं।
स्क्वैमस सेल कार्सिनोमा सतह की परत बनाने वाली कोशिकाओं से शुरू होने वाला कैंसर है। यह लगातार बने अल्सर, पपड़ी वाले हिस्से, मोटे चकत्ते या बढ़ती गांठ जैसा दिख सकता है। शुरुआती कैंसर छोटा और बिना दर्द का हो सकता है। गर्दन में साफ दिखने वाली गांठ होना जरूरी नहीं है।
ये दोनों समस्याएं एक साथ हो सकती हैं। धूप से प्रभावित बड़े हिस्से के बीच किसी छोटी जगह पर कैंसर बन सकता है। जरूरी सवाल यह है कि क्या होंठ के किसी हिस्से में टिशू की जांच चाहिए, न कि सिर्फ यह कि पूरा होंठ धूप से खराब हुआ दिख रहा है या नहीं।
- पूरे हिस्से में खुरदरापन और होंठ की धुंधली सीमा धूप से नुकसान का संकेत हैं, लेकिन इनसे कैंसर खारिज नहीं होता।
- किसी एक जगह इंड्यूरेशन, यानी घाव के नीचे असामान्य सख्ती, गहरे टिशू में बीमारी जाने का शक बढ़ाती है।
- अल्सर, लगातार पपड़ी जमना, अपने-आप खून आना या किसी हिस्से का नया मोटापन देखकर बायोप्सी की जरूरत और जगह तय करनी चाहिए।
- सिर्फ रंग, दर्द और घाव के आकार से सूजन, कैंसर से पहले के बदलाव और गहराई में फैल रहे कैंसर में भरोसेमंद फर्क नहीं किया जा सकता।
होंठ के लगातार अल्सर के और क्या कारण हो सकते हैं?
पहले तय करें कि घाव बाहर की त्वचा पर है, होंठ के रंगीन हिस्से पर है या अंदर की लाइनिंग पर। जगह के हिसाब से संभावित कारण बदलते हैं। मरीज के होंठ धूप से प्रभावित हों, तब भी अंदर का अल्सर अपने-आप एक्टिनिक काइलाइटिस नहीं माना जा सकता।
मरीज की हिस्ट्री और आसपास के बदलावों से संभावित कारणों को सीमित करें। चोट या सूजन का संभावित कारण मिलने से जांच में दिखे कैंसर के शक वाले संकेत नजरअंदाज नहीं किए जा सकते।
- चोट से बना अल्सर: उसी जगह लगने वाला नुकीला दांत, नकली दांत का किनारा या होंठ काटने की आदत कारण हो सकती है। कारण दूर करने के बाद घाव पूरी तरह भरा या नहीं, यह जांचकर रिकॉर्ड करें।
- जलन या एलर्जी से होंठ की सूजन: किसी चीज के संपर्क या होंठ चाटने से अक्सर फैली हुई लालिमा, पपड़ी और दरारें होती हैं। किसी एक जगह बना रहने वाला अल्सर फिर भी अलग जांच मांगता है।
- बार-बार होने वाला वायरल अल्सर: आमतौर पर यह दौरों में होता है, इसका जाना-पहचाना क्रम होता है और बीच में घाव भर जाता है। एक ही जगह लगातार अल्सर रहना इसका सामान्य रूप नहीं है।
- एफ्थस अल्सर: मुंह की अंदरूनी परत पर बार-बार होने वाले, आमतौर पर दर्द वाले छाले, जो बीच में भर जाते हैं। होंठ के रंगीन हिस्से पर लगातार अल्सर इसका सामान्य रूप नहीं है।
- इम्यून सिस्टम से जुड़ी बीमारी: शरीर की बचाव प्रणाली से जुड़ी लाइकेनॉइड सूजन, लूपस या फफोले बनाने वाली बीमारियों में सतह की उथली परत छिल सकती है। मुंह के दूसरे हिस्सों, त्वचा या आंखों में भी बदलाव देखें।
- इन्फेक्शन: कमजोर इम्यून सिस्टम, संपर्क की हिस्ट्री या शरीर के दूसरे लक्षण इसका संकेत दें तो इस संभावना पर विचार करें। जरूरत के अनुसार जांच करें; इनके बहाने बायोप्सी न टालें।
- दूसरा कैंसर: त्वचा पर असामान्य घाव, रंग में बदलाव या अंदर की परत के नीचे गांठ होने पर स्किन या सिर-गर्दन के स्पेशलिस्ट से व्यापक जांच की जरूरत हो सकती है।
मरीज की हिस्ट्री में किन बातों से चिंता बढ़ती है?
घाव कब शुरू हुआ, क्या कभी पूरी तरह भरा और उसमें क्या बदलाव आए, यह रिकॉर्ड करें। एक ही जगह बार-बार पपड़ी बनना अलग-अलग दौर नहीं, बल्कि लगातार बनी समस्या का संकेत हो सकता है। आकार बढ़ने, खून आने, महसूस करने की क्षमता बदलने और बोलने-खाने जैसी गतिविधियों में परेशानी के बारे में पूछें।
काम, यात्रा और बाहर समय बिताने से वर्षों में कितना धूप का संपर्क हुआ, इसका आकलन करें। मुंबई, ठाणे या आसपास के जिलों में बाहर काम करना प्रासंगिक हो सकता है, लेकिन सिर्फ जगह से डायग्नोसिस तय नहीं होता। तंबाकू का इस्तेमाल न करने से होंठ का कैंसर खारिज नहीं होता।
- तंबाकू, बिना धुएं वाला तंबाकू, सुपारी और शराब के इस्तेमाल की हिस्ट्री लें। रेफर करने के लिए इनका इस्तेमाल होना जरूरी न मानें।
- पहले हुए त्वचा या मुंह के कैंसर, होंठ पर पिछली प्रक्रियाओं, कमजोर इम्यून सिस्टम और ऑर्गन ट्रांसप्लांट के बारे में पूछें।
- होंठ काटने की आदत, दांत से चोट, नकली दांत का संपर्क, होंठ पर लगाए जाने वाले प्रोडक्ट और काम के दौरान होने वाले संपर्क रिकॉर्ड करें।
- गांठ, सुन्नपन, बिना स्पष्ट कारण खून आना, मुंह खोलने में दिक्कत और निगलने में दिक्कत के बारे में खास तौर पर पूछें।
- पुरानी तस्वीरें, बायोप्सी रिपोर्ट और पिछले ट्रीटमेंट की जानकारी देखें। कुछ समय के लिए लक्षण कम होना यह साबित नहीं करता कि घाव कैंसर-रहित है।
होंठ के अल्सर का चेकअप किस क्रम में करें?
लगातार बने होंठ के अल्सर की सामने से जांच जरूरी है। तस्वीरें यह तय करने में मदद कर सकती हैं कि कितनी जल्दी जांच चाहिए। लेकिन उनसे सख्ती, गहरे टिशू से चिपकाव या आसपास के लिम्फ नोड नहीं जांचे जा सकते। लिम्फ नोड शरीर की बचाव प्रणाली की छोटी ग्रंथियां हैं। मरीज को समझाएं कि शिकायत सिर्फ होंठ की होने पर भी पूरे मुंह और गर्दन की जांच जरूरी है।
अच्छी रोशनी में जांच करें। घाव का रूप बदलने वाली किसी भी प्रक्रिया से पहले उसका रिकॉर्ड बनाएं। सिर्फ 'होंठ का अल्सर' न लिखें। घाव कहां-कहां है और छूकर क्या महसूस होता है, इससे बायोप्सी की जगह और रेफरल की जल्दी तय होती है।
- दोनों होंठों को सामान्य स्थिति में और धीरे से पलटकर देखें। बाहरी त्वचा, रंगीन हिस्सा, अंदर की परत और मुंह के कोनों को पहचानें।
- घाव नापें। अल्सर, जमी या उतरती पपड़ी, लाल-सफेद बदलाव, किनारों की स्पष्टता और आसपास धूप से हुए नुकसान को दर्ज करें।
- धीरे से छूकर सख्ती, मोटाई, छूने पर दर्द और गहरे हिस्सों से चिपकाव जांचें। दूसरी तरफ से तुलना करें।
- निचले होंठ और ठुड्डी की संवेदना, होंठ की हरकत, मुंह कितना खुलता है और बताई गई निगलने की दिक्कत का आकलन करें।
- पूरा मुंह जांचें। जीभ के किनारे, जीभ के नीचे का हिस्सा और दूसरी जगहों पर अलग घाव भी देखें।
- आसपास के लिम्फ नोड जांचें, खासकर ठुड्डी के नीचे, जबड़े के नीचे और गर्दन में। महसूस होने वाले नोड का आकार, छूने पर दर्द, हिलना और सख्ती दर्ज करें।
- सहमति लेकर जांच की तस्वीरें लें। अलग-अलग जगहों का रूप अलग हो तो उनकी जगह दिखाने वाला नक्शा बनाएं।
किन संकेतों पर तुरंत रेफर या इमरजेंसी जांच करनी चाहिए?
दो हफ्ते से ज्यादा न भरने वाले अल्सर की सामने से जांच जरूरी है। सख्ती, लगातार बढ़ना, बिना स्पष्ट कारण खून आना, सुन्नपन या शक वाली गांठ पहले से हो तो दो हफ्ते पूरे होने का इंतजार न करें। तुरंत कदम उठाने के लिए दर्द होना जरूरी नहीं है।
कैंसर का शक हो तो उसी जांच वाली विजिट पर अर्जेंट रेफरल शुरू करें। स्थानीय संदिग्ध कैंसर रेफरल व्यवस्था का इस्तेमाल करें। जहां उपलब्ध हो, दो हफ्तों के अंदर जांच का अनुरोध करें। यह जल्दी जांच कराने का व्यावहारिक लक्ष्य है; इसका मतलब यह नहीं कि भारत की हर सेवा में एक जैसी रेफरल व्यवस्था है।
- बिना स्पष्ट कारण लगातार अल्सर, सख्त या चिपका हुआ घाव, बढ़ती गांठ, अनियमित उठे किनारे या धूप से प्रभावित हिस्से में एक जगह अल्सर होने पर अर्जेंट रेफर करें।
- गर्दन में नई गांठ, निचले होंठ या ठुड्डी का सुन्नपन, मुंह खोलने या निगलने में दिक्कत चिंता बढ़ाते हैं। रेफरल में इन्हें साफ और प्रमुखता से लिखें।
- तेजी से बढ़ती समस्या या बहुत कमजोर इम्यून सिस्टम में स्पेशलिस्ट से अर्जेंट चर्चा करने में देर न करें।
- सांस के रास्ते में रुकावट, अपनी लार न निगल पाना, बहुत ज्यादा और न रुकने वाला खून या शरीर में पानी बनाए रखने जितना भी तरल न पी पाना हो तो उसी दिन इमरजेंसी जांच कराएं।
- स्पष्ट रूप से चोट वाला और बिना संदिग्ध संकेतों का घाव हो तो कारण दूर करने के बाद कम अंतराल पर घाव भरने की समीक्षा तय और रिकॉर्ड की जा सकती है। बार-बार देखने की अवधि नए सिरे से शुरू न करें। पहले से लगातार बने संदिग्ध घाव का रेफरल न टालें।
होंठ के अल्सर की बायोप्सी कब और कैसे प्लान करें?
कैंसर या एपिथीलियल डिस्प्लेसिया का शक हो तो बायोप्सी जरूरी है। डिस्प्लेसिया का मतलब लाइनिंग की कोशिकाओं में असामान्य बदलाव है, जो कैंसर से पहले हो सकते हैं। एक्टिनिक काइलाइटिस में किसी एक जगह लगातार अल्सर, मोटापन, सख्ती, खून या बिना स्पष्ट कारण बदलता हिस्सा हो तो टिशू की जांच का आकलन करना चाहिए।
हर फैले हुए सूखे होंठ की तुरंत बायोप्सी जरूरी नहीं होती। लेकिन डायग्नोसिस साफ न हो, बदलाव बने रहें या टिशू को नष्ट करने वाला ट्रीटमेंट सोचा जा रहा हो, तो स्पेशलिस्ट को तय करना चाहिए कि हिस्टोलॉजी चाहिए या नहीं। हिस्टोलॉजी का मतलब माइक्रोस्कोप से टिशू की जांच है।
होंठ की बायोप्सी का अनुभव रखने वाला डॉक्टर सही जगह और ऐसा सैंपल लेने का तरीका चुने जिससे गहरे टिशू में फैलाव जांचा जा सके। सिर्फ पपड़ी या मरे हुए टिशू वाला सैंपल उपयोगी जानकारी नहीं दे सकता। अलग दिखने वाले हिस्सों के अलग सैंपल जरूरी हो सकते हैं। एक छोटा सैंपल पूरे प्रभावित हिस्से की स्थिति नहीं बता सकता।
- इन्सीजनल बायोप्सी में घाव का कुछ हिस्सा लिया जाता है। बड़े संदिग्ध हिस्से में यह अक्सर उचित होती है। चुनी हुई स्थितियों में छोटा घाव पूरा हटाना उचित हो सकता है।
- घाव के आकार, गहराई, जगह या आगे होंठ दोबारा बनाने की जरूरत पर शुरुआती प्रक्रिया का असर पड़ सकता हो, तो जिस सर्जन को रेफर कर रहे हैं उसके साथ योजना बनाएं।
- टिशू की रिपोर्ट देखने वाले पैथोलॉजिस्ट को सही जगह, घाव की अवधि, संभावित डायग्नोसिस, उपलब्ध तस्वीरें और गहराई में फैलाव के शक की जानकारी दें।
- इम्यून सिस्टम से जुड़ी फफोले वाली बीमारी का शक हो तो बायोप्सी से पहले स्पेशलिस्ट और लैब से अतिरिक्त सैंपल की जरूरत पर चर्चा करें।
- सतह की जांच, रोशनी पर आधारित सहायक जांच या ब्रश से लिए सैंपल में चिंता न दिखे, तब भी इन्हें जरूरी टिशू बायोप्सी का विकल्प न मानें।
होंठ के अल्सर में स्कैन कब मदद करते हैं?
बिना जटिलता वाली एक्टिनिक काइलाइटिस और छोटे सतही कैंसर में फर्क करने के लिए आमतौर पर स्कैन जरूरी नहीं होते। स्कैन से एपिथीलियल डिस्प्लेसिया तय नहीं किया जा सकता और यह बायोप्सी की जगह नहीं लेता। आसानी से पहुंच सकने वाले संदिग्ध अल्सर में रूटीन स्कैन टिशू की जांच में रुकावट नहीं बनने चाहिए।
जांच में गहराई में फैलाव, लिम्फ नोड में बीमारी, हड्डी पर असर या नस के रास्ते फैलाव का शक हो तो स्कैन उपयोगी होते हैं। कैंसर की स्टेज, यानी उसका फैलाव, जांचने के लिए कौन-से टेस्ट चाहिए, यह आगे देखभाल करने वाली कैंसर टीम घाव की जगह, जांच और पैथोलॉजी के अनुसार तय करे।
- गर्दन का अल्ट्रासाउंड असामान्य लिम्फ नोड की जांच और जरूरत होने पर स्कैन की मदद से सैंपल लेने में मदद कर सकता है।
- सीटी, यानी कंप्यूटेड टोमोग्राफी स्कैन, चुने हुए मामलों में गहरे हिस्से, हड्डी और आसपास के फैलाव को देखने में मदद कर सकता है।
- एमआरआई, यानी मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग, नरम टिशू में फैलाव या पेरिन्यूरल फैलाव के शक में उपयोगी हो सकती है। पेरिन्यूरल फैलाव का मतलब नस के रास्ते ट्यूमर फैलना है।
- दांतों का पैनोरमिक एक्स-रे और कोन-बीम सीटी होंठ के नरम टिशू के कैंसर की स्टेज का पर्याप्त आकलन नहीं करते।
- हर लगातार बने होंठ के अल्सर में एडवांस स्टेजिंग स्कैन रूटीन स्क्रीनिंग जांच नहीं है।
होंठ के संदिग्ध घाव के लिए किस स्पेशलिस्ट को रेफर करें?
घाव लगातार बना हो लेकिन डायग्नोसिस साफ न हो और गहराई में फैलाव के स्पष्ट संकेत न हों, तो जल्द ओरल मेडिसिन या डर्मेटोलॉजी में रेफर करें। ओरल मेडिसिन मुंह की बीमारियों की जांच से जुड़ी विशेषज्ञता है और डर्मेटोलॉजी त्वचा की। सेवा को होंठ की बीमारियों का अनुभव और बायोप्सी की सुविधा होनी चाहिए। टिशू की जांच या सर्जिकल आकलन चाहिए तो ओरल एंड मैक्सिलोफेशियल सर्जरी, यानी मुंह, जबड़े और चेहरे की सर्जरी की सेवा, भी उचित है।
जांच में गहराई में फैलने वाले कैंसर का शक हो तो सीधे सिर-गर्दन की कैंसर सेवा या होंठ के कैंसर का अनुभव रखने वाले सर्जन को रेफर करें। स्थानीय व्यवस्था के अनुसार यह मुंह-जबड़े की कैंसर सर्जरी, कान-नाक-गले की सिर-गर्दन सर्जरी, कैंसर सर्जरी या विशेष स्किन-कैंसर सेवा हो सकती है।
बाहरी त्वचा, होंठ के रंगीन हिस्से और अंदर की लाइनिंग के घावों की स्टेजिंग और ट्रीटमेंट के रास्ते अलग हो सकते हैं। सभी होंठ के कैंसर एक जैसे संभाले जाते हैं, ऐसा न मानें। घाव की शुरुआत की सही जगह लिखें। आगे देखभाल करने वाली अलग-अलग विशेषज्ञों की टीम यह फर्क तय करे।
- मुंबई और बड़े ठाणे क्षेत्र में कैंसर का शक हो तो ऐसी सेवा चुनें जहां पैथोलॉजी, गर्दन की उचित जांच और अलग-अलग कैंसर विशेषज्ञों की टीम उपलब्ध हो।
- रेफरल में अवधि, नाप, तस्वीरें, छूकर मिली जानकारी, संवेदना के बदलाव, लिम्फ नोड, जोखिम और पिछली हिस्टोलॉजी शामिल करें।
- उचित आधार हो तो 'होंठ के कैंसर का शक' साफ लिखें। इसे रूटीन कॉस्मेटिक या सामान्य डेंटल रेफरल न बनाएं।
- अपॉइंटमेंट हुआ या नहीं और बायोप्सी रिपोर्ट देखी गई या नहीं, इसका फॉलो-अप करें। जांच में देरी हो तो संबंधित सेवा से संपर्क करें या दूसरा अर्जेंट रास्ता तलाशें।
बायोप्सी रिपोर्ट के बाद क्या देखभाल होती है?
एक्टिनिक काइलाइटिस की देखभाल में आगे अल्ट्रावायलेट किरणों से बचाव और प्रभावित हिस्से के लिए स्पेशलिस्ट द्वारा ट्रीटमेंट चुनना शामिल है। विकल्पों में डॉक्टर की देखरेख में पूरे प्रभावित हिस्से का ट्रीटमेंट, खराब सतही टिशू हटाने वाली प्रक्रियाएं या होंठ के प्रभावित रंगीन हिस्से को सर्जरी से हटाना शामिल हैं। डर्मेटोलॉजी, ओरल मेडिसिन और अनुभवी सर्जिकल टीमें मिलकर देखभाल कर सकती हैं।
गहराई में फैलने वाले कैंसर की पुष्टि हो तो कैंसर स्पेशलिस्ट की देखभाल जरूरी है। सर्जरी से हटाना और निकाले गए टिशू के किनारों की जांच करना एक सामान्य तरीका है। बीमारी के फैलाव और विशेषज्ञ टीम की समीक्षा के अनुसार होंठ का आकार व कामकाज दोबारा बनाने की सर्जरी, आसपास के लिम्फ नोड की देखभाल, रेडियोथेरेपी यानी किरणों से ट्रीटमेंट, या पूरे शरीर पर असर करने वाला कैंसर ट्रीटमेंट चुना जा सकता है।
ट्रीटमेंट चुनते समय कैंसर को नियंत्रित करने के साथ होंठ का कामकाज, संवेदना, होंठ बंद होना और दिखावट भी देखें। किसी संदिग्ध जगह की पर्याप्त जांच से पहले टिशू नष्ट करने वाला ट्रीटमेंट न करें।
- गहराई में फैलाव के बिना डिस्प्लेसिया हो तो रिपोर्ट, प्रभावित क्षेत्र और जांच के आधार पर स्पेशलिस्ट की योजना जरूरी है।
- घाव सख्त हो, बढ़ रहा हो या अल्सर बना रहे तो रिपोर्ट में सिर्फ सूजन लिखे होने से डायग्नोसिस तय नहीं हो जाता।
- क्लिनिकल-पैथोलॉजिकल डिस्कॉर्डन्स का मतलब जांच और बायोप्सी रिपोर्ट का आपस में मेल न खाना है। ऐसी स्थिति में स्पेशलिस्ट की समीक्षा और संभवतः दोबारा सैंपल लेना जरूरी है।
- मरीज के अनुसार फॉलो-अप तय करें। नया अल्सर, मोटापन, खून, सुन्नपन या गांठ हो तो अगली तय विजिट का इंतजार न करें; दोबारा जांच कराएं।
इन फैसलों के लिए कौन-सी गाइडलाइन मदद करती हैं?
अमेरिकन डेंटल एसोसिएशन की 2017 की साक्ष्य-आधारित गाइडलाइन मुंह में कैंसर बनने की संभावना वाले बदलावों के आकलन पर है। यह जांच में संदिग्ध घाव मिलने पर तुरंत बायोप्सी या स्पेशलिस्ट रेफरल का समर्थन करती है। मुंह की लाइनिंग की जांच में इसका मुख्य सिद्धांत है कि सहायक जांचों से पक्के डायग्नोसिस के लिए जरूरी टिशू जांच में देरी न हो। यह खास तौर पर एक्टिनिक काइलाइटिस की गाइडलाइन नहीं है।
NICE की NG12 गाइडलाइन, 'Suspected cancer: recognition and referral', बिना स्पष्ट कारण तीन हफ्ते से ज्यादा बने मुंह के अल्सर या लगातार बनी गर्दन की गांठ के लिए संदिग्ध कैंसर रेफरल की सलाह देती है। इसमें होंठ या मुंह की गांठ की अर्जेंट जांच भी शामिल है। इस लेख में दो हफ्ते पर सामने से जांच कराने की सलाह सुरक्षा के लिए है। यह NICE के अल्सर की अवधि वाले मानदंड का उद्धरण नहीं है।
अमेरिकन एकेडमी ऑफ डर्मेटोलॉजी की त्वचा के स्क्वैमस सेल कार्सिनोमा की गाइडलाइन पर्याप्त बायोप्सी सैंपल, जोखिम के अनुसार स्कैन और स्पेशलिस्ट देखभाल का समर्थन करती है। इसका दायरा त्वचा का कैंसर है। होंठ के रंगीन हिस्से या अंदर की लाइनिंग के घाव पर कौन-सा रास्ता लागू होगा, यह ट्रीटमेंट करने वाली टीम तय करे। ये सिद्धांत जल्दी डायग्नोसिस में मदद करते हैं, लेकिन हर होंठ के घाव को एक जैसा नहीं मानते।
- ADA की ओरल कैंसर गाइडलाइन की जानकारी: https://www.ada.org/resources/research/science-and-research-institute/evidence-based-dental-research/oral-cancer-guideline
- NICE NG12 में कैंसर की जगह के अनुसार सलाह: https://www.nice.org.uk/guidance/ng12/chapter/1-recommendations-organised-by-site-of-cancer
- अमेरिकन एकेडमी ऑफ डर्मेटोलॉजी की त्वचा के स्क्वैमस सेल कार्सिनोमा की गाइडलाइन की जानकारी: https://www.aad.org/member/clinical-quality/guidelines/scc
Questions people ask
क्या धूप से होंठ का नुकसान और कैंसर साथ हो सकते हैं?
हां। धूप से प्रभावित होंठ के बड़े रंगीन हिस्से के बीच किसी छोटी जगह पर गहराई में फैलने वाला कैंसर हो सकता है। लगातार अल्सर, सख्त जगह या बढ़ती गांठ को आसपास की फैली पपड़ी से अलग जांचें।
होंठ के अल्सर में दर्द नहीं है, तो भी बायोप्सी चाहिए?
दर्द से भरोसेमंद तरीके से तय नहीं होता कि घाव कैंसर है या नहीं। बिना स्पष्ट कारण लगातार अल्सर, खासकर सख्ती, खून या बढ़ते आकार के साथ हो, तो जल्द स्पेशलिस्ट की जांच और शक होने पर बायोप्सी चाहिए।
क्या रेफर करने से पहले तीन हफ्ते इंतजार करना चाहिए?
नहीं। संदिग्ध संकेत मिलते ही कदम उठाना चाहिए। दो हफ्ते से ज्यादा बने अल्सर की सामने से जांच जरूरी है। बिना स्पष्ट कारण मुंह के अल्सर के लिए NICE का तीन हफ्ते से ज्यादा वाला मानदंड संदिग्ध घाव का रेफरल टालने की वजह नहीं है।
होंठ काटने की आदत हो तो क्या सिर्फ नजर रखना सुरक्षित है?
सिर्फ तब, जब जांच में भरोसे के साथ कोई संदिग्ध संकेत न मिले और कारण दूर करने के बाद घाव भरना जांचकर रिकॉर्ड किया जाए। चोट और कैंसर साथ हो सकते हैं। लगातार अल्सर या सख्ती को आगे जांच किए बिना सिर्फ होंठ काटने से हुआ न मानें।
क्या फोटो से एक्टिनिक काइलाइटिस का पता चल सकता है?
नहीं। तस्वीरों से प्रभावित जगह और बदलाव रिकॉर्ड करने में मदद मिलती है। लेकिन गहराई, सख्ती, चिपकाव या गर्दन के लिम्फ नोड नहीं जांचे जा सकते। लगातार अल्सर की सामने से जांच जरूरी है।
क्या बायोप्सी से पहले स्कैन कराना चाहिए?
छोटे, सतही और आसानी से पहुंच सकने वाले घाव में आमतौर पर नहीं। गहरी बीमारी, असामान्य लिम्फ नोड या नस पर असर का शक हो तो स्कैन चुने जाते हैं। जटिल मामलों में डायग्नोसिस टालने के बजाय आगे देखभाल करने वाले स्पेशलिस्ट से तालमेल करें।
बायोप्सी में सिर्फ सूजन आए लेकिन अल्सर बना रहे तो क्या करें?
दोबारा देखें कि सैंपल चिंता वाली सही जगह से था या नहीं और रिपोर्ट जांच में दिख रहे बदलाव समझाती है या नहीं। जांच में चिंता बनी रहे तो स्पेशलिस्ट समीक्षा, पैथोलॉजिस्ट से चर्चा और संभवतः दोबारा या अतिरिक्त बायोप्सी चाहिए।
निचले होंठ के संदिग्ध घाव के लिए किस डॉक्टर को दिखाएं?
डायग्नोसिस साफ न होने पर बायोप्सी की सुविधा वाले ओरल मेडिसिन, डर्मेटोलॉजी या ओरल एंड मैक्सिलोफेशियल सर्जरी विभाग में जांच हो सकती है। गहराई में फैलने वाले कैंसर का स्पष्ट शक हो तो घाव की शुरुआत की जगह के अनुसार अर्जेंट सिर-गर्दन कैंसर या विशेष स्किन-कैंसर सेवा में रेफर करें।
This page is general information, not a diagnosis. A mouth problem needs to be looked at in person or on video before anyone can tell you what it is.