Oral Medicine for Doctors · 11 min read · हिन्दी

ऑटोइम्यून बीमारियों में मुंह में छाले और छिलना कैसे पहचानें?

ऑटोइम्यून बीमारियों में शरीर का इम्यून सिस्टम अपने ही टिश्यू पर हमला करता है। मुंह में इन बीमारियों के कारण अक्सर साबुत पानी भरे छालों के बजाय दर्द वाले छिले हिस्से, छिलते गम्स या बार-बार छाले दिखते हैं। पहचान के लिए क्लिनिकल चेकअप और सही जगह से लिए गए टिश्यू की हिस्टोलॉजी व डायरेक्ट इम्यूनोफ्लोरेसेंस जांच जरूरी होती है। शक होने पर स्पेशलिस्ट को दिखाना चाहिए। आंख की तकलीफ, सांस के रास्ते से जुड़े लक्षण या निगल न पाना हो तो तुरंत जरूरी मेडिकल मदद दिलाएं।

Written and medically reviewed by

Dr. Bipin R. Upadhyay

BDS · MDS Oral Medicine & Radiology · PhD Scholar · Associate Professor & Head, Department of Dentistry

Last clinically reviewed: 2026-10-31

Key points

  • मुंह की ऑटोइम्यून छाले वाली बीमारी में अक्सर दिखते छालों के बजाय छिले घाव या लाल-छिलते गम्स होते हैं।
  • बायोप्सी से पहले संबंधित लैब के साथ रूटीन हिस्टोलॉजी और डीआईएफ सैंपल की योजना बनाएं।
  • नेगेटिव डीआईएफ या ब्लड टेस्ट से बीमारी अपने आप खारिज नहीं होती।
  • आंख, सांस के रास्ते और निगलने पर असर से तय होता है कि रेफरल कितना जल्दी चाहिए।
  • एक जगह लगातार रहने वाले अल्सर और कैंसर के दूसरे चेतावनी संकेतों की जांच ऑटोइम्यून बीमारी से अलग करें।

मुंह में कौन-से लक्षण देखकर ऑटोइम्यून बीमारी का शक करें?

इन बीमारियों में इम्यून सिस्टम उन प्रोटीन पर हमला करता है जो मुंह की ऊपरी परत की कोशिकाओं को आपस में या नीचे के टिश्यू से जोड़कर रखते हैं। इस ऊपरी परत को एपिथीलियम कहते हैं। परत अलग होने से पानी भरे छाले बनते हैं। ये अक्सर चेकअप से पहले ही फूट जाते हैं।

बुल्ला का मतलब बड़ा, तरल से भरा छाला है। इरोजन का मतलब ऊपरी परत का उथला हिस्सा छिल जाना है। त्वचा पर लक्षण दिखने से पहले मुंह में बीमारी शुरू हो सकती है। इसलिए त्वचा सामान्य दिखने पर भी ऑटोइम्यून कारण को खारिज नहीं किया जा सकता। मुंह की कई जगहों पर लगातार छिले हिस्सों पर खास ध्यान दें।

डेस्क्वामेटिव जिंजिवाइटिस का मतलब लाल, छिलते या आसानी से खून निकलने वाले गम्स हैं। यह लक्षणों का नाम है, किसी एक बीमारी का नाम नहीं। इसकी वजह ऑटोइम्यून छाले वाली बीमारी या सूजन पैदा करने वाली दूसरी समस्या हो सकती है।

  • मुंह की कई जगहों पर दर्द वाले, टेढ़े-मेढ़े छिले हिस्से। कभी इनके किनारों पर ढीली ऊपरी परत दिखती है।
  • दांतों पर दिखने वाली प्लाक, यानी चिपकी मैल की परत, के मुकाबले गम्स में बहुत ज्यादा दर्द और छिलना।
  • मरीज का छाले होने की बात बताना, लेकिन चेकअप के समय छाले न दिखना।
  • मुंह की नाजुक अंदरूनी परत का हल्की रगड़ या सामान्य डेंटल काम से अलग हो जाना।
  • मुंह के घावों के साथ आंख में जलन, त्वचा पर छाले, प्राइवेट पार्ट्स में लक्षण, आवाज बैठना या निगलने में परेशानी।

किन बीमारियों में मुंह में ऐसे छाले और घाव होते हैं?

पेम्फिगस वल्गैरिस एक ऑटोइम्यून छाले वाली बीमारी है। इसके छाले नाजुक होते हैं, इसलिए मुंह में अक्सर लगातार दर्द वाले छिले घाव दिखते हैं। गालों की अंदरूनी सतह, तालू, होंठ, जीभ और गम्स प्रभावित हो सकते हैं। मुंह के घाव त्वचा के घावों से पहले आ सकते हैं। ये आम तौर पर ज्यादा स्थायी निशान छोड़े बिना भरते हैं।

म्यूकस मेम्ब्रेन पेम्फिगॉइड मुख्य रूप से मुंह और दूसरे अंगों की नम अंदरूनी परतों को प्रभावित करने वाली ऑटोइम्यून बीमारी है। इसमें गम्स की परेशानी आम है। कभी-कभी बिना फूटे छाले भी दिखते हैं। मुंह में बीमारी हल्की होने का मतलब यह नहीं कि बाकी अंगों में भी हल्की होगी। आंख या सांस के रास्ते में बीमारी से स्थायी निशान और सिकुड़न बन सकती है, जिससे उनका काम प्रभावित हो सकता है।

  • बुलस पेम्फिगॉइड: इसमें आम तौर पर त्वचा की बीमारी ज्यादा होती है। मुंह भी प्रभावित हो सकता है। लेकिन अगर बीमारी मुख्य रूप से मुंह में और काफी फैली हो, तो दूसरे कारण भी सोचें।
  • पैरानियोप्लास्टिक पेम्फिगस: मुंह और होंठों में गंभीर, लगातार सूजन और छिले घाव होते हैं। साथ में अलग-अलग तरह के त्वचा के घाव भी हो सकते हैं। इसका शरीर में मौजूद किसी ट्यूमर से संबंध हो सकता है, इसलिए त्वचा के स्पेशलिस्ट और मेडिकल टीम का मिलकर चेकअप जरूरी है।
  • लीनियर आईजीए डिजीज: इसमें इम्युनोग्लोबुलिन ए नाम का इम्यून प्रोटीन शामिल होता है। मुंह के लक्षण पेम्फिगॉइड जैसे लग सकते हैं। फर्क समझने के लिए लैब जांच जरूरी है।
  • एपिडर्मोलाइसिस बुलोसा एक्विजिटा: यह बाद में विकसित होने वाली ऑटोइम्यून बीमारी है। इसमें रगड़ या चोट से छाले, अंदरूनी नम परतों की बीमारी और स्थायी निशान हो सकते हैं।
  • बुलस ल्यूपस: यह सिस्टमिक ल्यूपस से जुड़े छाले हैं। सिस्टमिक ल्यूपस ऐसी ऑटोइम्यून बीमारी है जो कई अंगों को प्रभावित कर सकती है। मेडिकल हिस्ट्री में इसके संकेत मिलें तो इस संभावना पर विचार करें।

मुंह के छिलने और घावों के दूसरे कारण क्या हो सकते हैं?

सिर्फ घाव का रूप देखकर उसका कारण तय करना मुश्किल है। घाव कहां हैं, बार-बार होते हैं या नहीं, साथ में सफेद बदलाव हैं या नहीं, शरीर के दूसरे लक्षण और टिश्यू की रिपोर्ट—इन सबको मिलाकर संभावित कारण तय करें। हर छिलते गम्स की समस्या को पेम्फिगॉइड न मानें।

पॉजिटिव निकोल्स्की साइन का मतलब है कि हल्का दबाव देने पर ऊपरी परत अलग हो जाती है। यह परत के नाजुक होने का संकेत है, लेकिन किसी एक बीमारी की पक्की पहचान नहीं। इसे बार-बार जांचने से बेवजह चोट लगती है। यह बायोप्सी, यानी जांच के लिए टिश्यू का छोटा सैंपल लेने, का विकल्प नहीं है।

  • इरोसिव ओरल लाइकेन प्लेनस: मुंह की सूजन वाली बीमारी, जिसमें छिले घाव हो सकते हैं। साथ में जाली जैसी सफेद लकीरें और दोनों तरफ घाव देखें। कुछ मामलों में सिर्फ चेकअप से फर्क करना मुश्किल रहता है।
  • चोट या किसी चीज के संपर्क से नुकसान: रगड़ या दबाव का स्थानीय कारण, हाल का डेंटल ट्रीटमेंट या किसी चीज के संपर्क से जुड़ा पैटर्न देखें।
  • बार-बार होने वाले एफ्थस अल्सर, यानी सामान्य दर्द वाले मुंह के छाले: इनमें आम तौर पर अलग-अलग समय पर सीमित अल्सर होते हैं, न कि बड़े हिस्से की परत छिलती है।
  • इन्फेक्शन: अचानक शुरुआत, शरीर की बीमारी, कमजोर इम्यून सिस्टम या घावों के खास फैलाव पर ध्यान दें। ऑटोइम्यून बीमारी के ऊपर इन्फेक्शन भी हो सकता है।
  • त्वचा और अंदरूनी परतों की अचानक गंभीर प्रतिक्रिया: मुंह में अचानक बहुत फैले घावों के साथ बुखार, त्वचा के घाव या आंख की परेशानी हो तो अस्पताल में तुरंत चेकअप जरूरी है।
  • मुंह का कैंसर: एक जगह लगातार अल्सर, सख्त हिस्सा, गांठ या बिना स्पष्ट वजह खून आना हो तो अलग से जांच जरूरी है। पहले से ऑटोइम्यून बीमारी होने पर भी इसे नजरअंदाज न करें।

मरीज का चेकअप किस क्रम में करें?

सबसे पहले सांस, निगलने की क्षमता, शरीर में पानी की कमी और सामान्य हालत देखें। विस्तार से डेंटल चेकअप करने से पहले आंख के लक्षण पूछें। फोटो और घावों की जगह दिखाने वाला नक्शा रिकॉर्ड रखने में मदद करते हैं। इससे नाजुक टिश्यू को बार-बार छूना नहीं पड़ता।

लगातार या बार-बार छिलने और घाव होने पर सामने से चेकअप जरूरी है। ऑनलाइन सलाह से जरूरी मदद की प्राथमिकता तय करने या फॉलो-अप में सहायता मिल सकती है। लेकिन इससे टिश्यू की सख्ती जांचना, सभी अंदरूनी जगहें देखना या जांच का सैंपल लेना संभव नहीं है।

  • हिस्ट्री: शुरुआत, बढ़ना, बार-बार होना, दर्द, खून आना, खाने में दिक्कत, वजन में बदलाव और पिछली जांच पूछें।
  • संपर्क और ट्रीटमेंट की जानकारी: चल रहे और हाल में शुरू हुए डॉक्टर के ट्रीटमेंट, डेंटल मटीरियल और मुंह की सफाई के प्रोडक्ट दर्ज करें। सिर्फ इनके इस्तेमाल से इन्हें कारण न मान लें।
  • मुंह के बाहर का चेकअप: आसानी से देखी जा सकने वाली त्वचा और होंठ देखें। गर्दन की लिम्फ नोड्स, यानी इम्यून सिस्टम से जुड़ी छोटी ग्रंथियां, जांचें। चेहरे या गर्दन की सूजन दर्ज करें।
  • मुंह का चेकअप: गम्स, तालू, जीभ, जीभ के नीचे का हिस्सा और जहां तक देख सकें पीछे के हिस्सों सहित हर सतह को धीरे से जांचें।
  • घावों का विवरण: छिले हिस्सों का फैलाव, साबुत छाले, सफेद लकीरें, स्थायी निशान, किसी जगह सख्ती और चोट के स्थानीय कारण दर्ज करें।
  • दूसरे अंगों के लक्षण: आंख में किरकिराहट या लाली, रोशनी से तकलीफ, नजर में बदलाव, नाक में पपड़ी, आवाज बैठना, निगलने में दर्द और प्राइवेट पार्ट्स के लक्षण पूछें।
  • रोजमर्रा की क्षमता: मुंह कितना खुलता है, खाना-पानी कितना ले पा रहे हैं और मुंह की सफाई रख पा रहे हैं या नहीं, दर्ज करें।

मुंह के घाव की बायोप्सी कब और किस जगह से लें?

लगातार छिले घाव, बिना स्पष्ट कारण लाल और छिलते गम्स या बार-बार अंदरूनी परत में छाले हों और ऑटोइम्यून बीमारी का शक हो, तो बायोप्सी की व्यवस्था करें। त्वचा पर घाव या मुंह में साबुत छाला दिखने का इंतजार न करें। सही सैंपल लेने या उसे संभालने की सुविधा न हो तो बिना योजना सैंपल लेने के बजाय ओरल मेडिसिन, यानी मुंह की बीमारियों के स्पेशलिस्ट, या त्वचा के स्पेशलिस्ट को रेफर करें।

पहचान के लिए आम तौर पर रूटीन हिस्टोलॉजी और डायरेक्ट इम्यूनोफ्लोरेसेंस, यानी डीआईएफ, के अलग सैंपल चाहिए। हिस्टोलॉजी में टिश्यू की बनावट देखी जाती है। डीआईएफ में टिश्यू के अंदर जमा इम्यून प्रोटीन देखे जाते हैं। इसके सैंपल को संभालने का तरीका रूटीन हिस्टोलॉजी से अलग होता है।

  • रूटीन हिस्टोलॉजी के लिए नए घाव का ऐसा किनारा चुनें जिसमें ऊपरी परत बची हो और साथ में नीचे का जोड़ने-सहारा देने वाला टिश्यू हो। सिर्फ अल्सर के बीच का हिस्सा लेने से अक्सर केवल सूजन दिखती है, जिसका कारण साफ नहीं होता।
  • डीआईएफ के लिए छिले हुए तल के बजाय घाव के पास की साबुत परत से सैंपल लें। म्यूकस मेम्ब्रेन पेम्फिगॉइड का शक हो तो सही तरह चुनी गई, सामान्य दिखने वाली गाल की अंदरूनी परत भी जांच में उपयोगी हो सकती है।
  • बायोप्सी से पहले सैंपल लेने वाली लैब से बात करें। सैंपल भेजने के लिए जरूरी माध्यम, कंटेनर और पहुंचाने की व्यवस्था की पुष्टि करें।
  • डीआईएफ का सैंपल रूटीन हिस्टोलॉजी के सैंपल से अलग रखें। हिस्टोलॉजी के लिए टिश्यू को सुरक्षित करने की सामान्य प्रक्रिया उसे स्टैंडर्ड डीआईएफ के लिए अनुपयोगी बना सकती है।
  • हर सैंपल की जगह और जांच का उद्देश्य साफ लिखें। संभावित बीमारियां, घावों का फैलाव और संबंधित ट्रीटमेंट हिस्ट्री भी भेजें।

हिस्टोलॉजी, डीआईएफ और ब्लड टेस्ट की रिपोर्ट कैसे समझें?

पेम्फिगस में आम तौर पर एकैंथोलाइसिस दिखता है। इसका मतलब ऊपरी परत की कोशिकाओं का आपसी जुड़ाव टूटना है। पेम्फिगस वल्गैरिस में अक्सर सबसे निचली कोशिका-परत के ठीक ऊपर अलगाव होता है। डीआईएफ में आम तौर पर कोशिकाओं के बीच इम्यून प्रोटीन जमा दिखते हैं।

पेम्फिगॉइड समूह की बीमारियों में आम तौर पर ऊपरी परत के नीचे अलगाव होता है। डीआईएफ में अक्सर बेसमेंट मेम्ब्रेन जोन पर लाइन की तरह जमा प्रोटीन दिखते हैं। यह ऊपरी परत और नीचे के टिश्यू के बीच की सीमा है। इस पैटर्न से बीमारी के समूह का संकेत मिलता है, लेकिन अकेले इससे हर उपप्रकार की पहचान नहीं होती।

स्पेशलिस्ट लैब इंडायरेक्ट इम्यूनोफ्लोरेसेंस कर सकती हैं। इसमें खून में घूम रही एंटीबॉडी, यानी इम्यून सिस्टम के बनाए प्रोटीन, जांचे जाते हैं। खास टारगेट प्रोटीन के खिलाफ जांच भी हो सकती है। साल्ट-स्प्लिट टेस्ट में लैब में अलग की गई टिश्यू परतों से देखा जाता है कि एंटीबॉडी कहां जुड़ती हैं। ये टेस्ट पहचान को ज्यादा स्पष्ट करते हैं। ये क्लिनिकल चेकअप और टिश्यू जांच की जगह नहीं लेते।

  • बीमारी का मजबूत क्लिनिकल शक हो तो नेगेटिव डीआईएफ से बीमारी खारिज नहीं होती।
  • नेगेटिव रिपोर्ट मान लेने से पहले सैंपल की जगह, ऊपरी परत की हालत, भेजने और जांचने की प्रक्रिया तथा पिछले ट्रीटमेंट की समीक्षा करें।
  • क्लिनिकल लक्षण और टिश्यू रिपोर्ट को साथ रखकर स्पेशलिस्ट से समीक्षा कराएं। उनकी टीम के जरिए दोबारा या दूसरी जगह से सैंपल लेने पर विचार करें।
  • ब्लड एंटीबॉडी टेस्ट नेगेटिव होने से म्यूकस मेम्ब्रेन पेम्फिगॉइड भरोसेमंद तरीके से खारिज नहीं होता।
  • रिपोर्ट और क्लिनिकल लक्षण मेल न खाएं तो किसी एक नतीजे पर भरोसा करने के बजाय पहचान की दोबारा समीक्षा करें।

एक्स-रे, स्कैन या दूसरी जांच कब जरूरी है?

सामान्य डेंटल एक्स-रे, कोन-बीम सीटी यानी जबड़े का तीन आयामी स्कैन, और एमआरआई यानी चुंबकीय तकनीक वाला स्कैन, इन ऑटोइम्यून छाले वाली बीमारियों की पहचान नहीं करते। सिर्फ मुंह की अंदरूनी परत की बीमारी इन स्कैन का कारण नहीं है। क्लिनिकल चेकअप, हिस्टोलॉजी और टिश्यू में इम्यून बदलावों की जांच मुख्य हैं।

जांच किसी खास दूसरे संभावित कारण, जटिलता या प्रभावित अंग के लिए होनी चाहिए। गर्दन की संदिग्ध लिम्फ नोड, गहरी सूजन, किसी हिस्से का सुन्न होना या हड्डी प्रभावित होने का शक हो तो अलग जांच जरूरी है। इन्हें केवल मुंह की ऊपरी परत की बीमारी न मानें।

  • चेकअप में साथ की दांत या जबड़े की समस्या का शक हो तो डेंटल इमेजिंग करें।
  • सांस के रास्ते से जुड़े लक्षणों में कान-नाक-गला स्पेशलिस्ट को रेफर करें। जांच में अंदर सीधे देखकर चेकअप करना शामिल हो सकता है।
  • निगलने के लक्षण लगातार रहें तो पेट और खाने की नली के स्पेशलिस्ट का चेकअप जरूरी हो सकता है। जरूरत के अनुसार कैमरे वाली जांच, यानी एंडोस्कोपी, की जा सकती है।
  • पैरानियोप्लास्टिक पेम्फिगस का शक हो तो संबंधित ट्यूमर की जांच स्पेशलिस्ट की देखरेख में करें। सिर्फ मुंह के छिले घावों के आधार पर बिना तय कारण कई स्कैन न कराएं।
  • शरीर की अन्य जांच संभावित बीमारी, पोषण पर असर, साथ की बीमारियों और आगे की स्पेशलिस्ट देखभाल के अनुसार तय करें।

मरीज को कब और किस स्पेशलिस्ट के पास भेजें?

रेफरल की जल्दी इस बात से तय होती है कि किस अंग को खतरा है और खाने, निगलने या सांस लेने जैसी क्षमता कितनी प्रभावित है। सिर्फ मुंह के घाव का आकार काफी नहीं है। नीचे दी गई प्राथमिकताएं व्यावहारिक क्लिनिकल मार्गदर्शन हैं। ये किसी एक गाइडलाइन से ली गई, हर जगह लागू अपॉइंटमेंट समय-सीमाएं नहीं हैं। बायोप्सी रिपोर्ट के इंतजार में इमरजेंसी चेकअप न रोकें।

म्यूकस मेम्ब्रेन पेम्फिगॉइड का शक हो या पुष्टि हो चुकी हो, तो आंख के लक्षण न होने पर भी आंख के स्पेशलिस्ट का चेकअप कराएं। शुरुआती बीमारी के संकेत बहुत हल्के हो सकते हैं। मुंह का चेकअप आंख की सतह को ढकने वाली परत में सूजन या स्थायी निशान को खारिज नहीं कर सकता।

  • तुरंत इमरजेंसी विभाग: सांस में परेशानी, सांस लेते समय असामान्य आवाज, लार न निगल पाना, तेजी से बिगड़ते गले के लक्षण, शरीर में पानी की गंभीर कमी या बहुत फैले छालों के साथ पूरे शरीर की तबीयत खराब होना। सांस के रास्ते का खतरा हो तो इमरजेंसी कान-नाक-गला टीम की मदद चाहिए।
  • उसी दिन आंख के स्पेशलिस्ट का जरूरी चेकअप: म्यूकस मेम्ब्रेन पेम्फिगॉइड के शक वाले मरीज में लाल या दर्द वाली आंख, रोशनी से तकलीफ, नजर में बदलाव या नई और लगातार किरकिराहट। सीधे स्पेशलिस्ट न मिलें तो आंख की इमरजेंसी सेवा लें।
  • जल्दी कान-नाक-गला रेफरल: लगातार आवाज बैठना, आवाज बनने वाले हिस्से में बीमारी का शक या सांस के ऊपरी रास्ते के बढ़ते लक्षण, भले अभी सांस की तकलीफ न हो। सांस प्रभावित होते ही तुरंत इमरजेंसी मदद लें।
  • जल्दी मेडिकल या पेट-खाने की नली के स्पेशलिस्ट का चेकअप: बढ़ती निगलने की परेशानी, निगलने में दर्द या खाना-पानी कम हो जाना। पानी या लार भी न निगल पाएं तो इमरजेंसी चेकअप जरूरी है।
  • बिना देर ओरल मेडिसिन और त्वचा के स्पेशलिस्ट को रेफरल: बिना स्पष्ट कारण कई जगह छिले घाव, बार-बार छाले या लाल-छिलते गम्स, जिनमें टिश्यू जांच और मिलकर देखभाल की जरूरत हो।
  • जल्दी ओरल मेडिसिन, मुंह-जबड़े के सर्जन या सिर-गर्दन की कैंसर टीम का चेकअप: दो हफ्ते से ज्यादा न भरने वाला अल्सर, गांठ, सुन्नपन, बिना स्पष्ट वजह खून आना या मुंह खोलने में परेशानी। निगलने की परेशानी की भी जांच जरूरी है। कितनी जल्दी जांच चाहिए, यह उसकी गंभीरता से तय होगा।

रेफरल में कौन-सी जानकारी भेजें?

अच्छे रेफरल में संभावित बीमारी, अंगों को खतरा और अभी की मुख्य परेशानी साफ लिखी होती है। साफ बताएं कि आंख, सांस के रास्ते और निगलने के लक्षण पूछे गए हैं या नहीं। जरूरी रेफरल हो तो केवल सामान्य बुकिंग रिक्वेस्ट पर निर्भर न रहें। संबंधित टीम से सीधे बात करें।

मुंबई, ठाणे, अंबरनाथ और आसपास के इलाकों में ओरल मेडिसिन, त्वचा, आंख और सांस के रास्ते की उपलब्ध विशेषज्ञ सुविधाओं के हिसाब से केंद्र चुनें। सुविधा या दूरी के कारण ऐसे अस्पताल भेजने में देर न हो, जो अंगों को खतरे वाली बीमारी संभाल सके।

  • लक्षण कब शुरू हुए, कौन-सी जगहें प्रभावित हैं, रोजमर्रा के काम पर असर और वजन में कोई कमी।
  • मरीज की सहमति से ली गई क्लिनिकल फोटो और घावों की जगह का साफ नक्शा।
  • संबंधित मेडिकल हिस्ट्री, चल रहे ट्रीटमेंट की जानकारी और पहले बताई गई बीमारियां।
  • बायोप्सी रिपोर्ट, सैंपल की जगहें, डीआईएफ रिपोर्ट और उपलब्ध एंटीबॉडी टेस्ट।
  • खास खतरे के संकेत और जल्दी रेफरल मांगने का कारण।
  • बाकी रिपोर्ट देखने और मरीज से संपर्क करने की जिम्मेदारी वाले डॉक्टर या सेवा का नाम।

ट्रीटमेंट में क्या होता है और कौन देखभाल करता है?

ट्रीटमेंट का मकसद इम्यून सिस्टम से हो रहे नुकसान को नियंत्रित करना, तकलीफ घटाना, पोषण बनाए रखना और संवेदनशील अंगों में स्थायी निशान रोकना है। बीमारी का ट्रीटमेंट ओरल मेडिसिन और त्वचा के स्पेशलिस्ट को मिलकर संभालना चाहिए। विकल्प बीमारी की पहचान, फैलाव और आंख, सांस के रास्ते या दूसरे अंगों के प्रभावित होने पर निर्भर करते हैं।

सीमित बीमारी के कुछ मामलों में प्रभावित जगह की सूजन कम करने वाली देखभाल दी जा सकती है। ज्यादा फैली या अधिक जोखिम वाली बीमारी में पूरे शरीर के इम्यून सिस्टम की गतिविधि बदलने वाला ट्रीटमेंट जरूरी हो सकता है। चुने हुए मामलों में स्पेशलिस्ट की देखरेख में एडवांस इम्यून थेरेपी पर विचार होता है। इन फैसलों के लिए बीमारी की पुष्टि, जोखिम का आकलन और निगरानी जरूरी है।

  • डेंटिस्ट नरमी से प्लाक हटाने में मदद करते हैं, चोट पहुंचाने वाले दांतों के कारण ठीक करते हैं और नाजुक अंदरूनी परत के अनुसार डेंटल काम में बदलाव करते हैं।
  • आंख के स्पेशलिस्ट आंख का ट्रीटमेंट और स्थायी निशान बनने की निगरानी संभालते हैं।
  • कान-नाक-गला स्पेशलिस्ट आवाज बनने वाले हिस्से या सांस के ऊपरी रास्ते की बीमारी संभालते हैं।
  • पेट-खाने की नली के स्पेशलिस्ट, पोषण टीम और दूसरे स्पेशलिस्ट निगलने, खाना-पानी लेने और अन्य प्रभावित अंगों की देखभाल में मदद करते हैं।
  • ऐसे गैर-जरूरी डेंटल काम टालें जिनसे अभी सूजी हुई अंदरूनी परत को चोट लगे। लेकिन जरूरी डेंटल बीमारी का ट्रीटमेंट संबंधित टीमों के साथ तालमेल बनाकर करें।
  • फॉलो-अप में मुंह की बीमारी की गतिविधि, रोजमर्रा की क्षमता, मुंह के बाहर नए लक्षण और आसपास की बीमारी से अलग व्यवहार वाले किसी खास घाव की दोबारा जांच करें।

इस तरीके के पीछे कौन-सी क्लिनिकल गाइडलाइन हैं?

यूरोपियन एकेडमी ऑफ डर्मेटोलॉजी एंड वेनेरियोलॉजी की म्यूकस मेम्ब्रेन पेम्फिगॉइड की पहचान और देखभाल पर एस3 गाइडलाइन के भाग एक और दो, 2021 में जर्नल ऑफ द यूरोपियन एकेडमी ऑफ डर्मेटोलॉजी एंड वेनेरियोलॉजी में प्रकाशित हुए। ये क्लिनिकल लक्षण और टिश्यू में इम्यून बदलावों की जांच को मिलाकर पहचान करने का समर्थन करते हैं। प्रभावित अंगों की जांच और जहां स्थायी निशान से अंग का काम बिगड़ सकता है, वहां कई स्पेशलिस्ट की साझा देखभाल पर भी जोर देते हैं।

अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ पैनल की “डायग्नोसिस एंड मैनेजमेंट ऑफ पेम्फिगस” सिफारिशें 2020 में जर्नल ऑफ द अमेरिकन एकेडमी ऑफ डर्मेटोलॉजी में प्रकाशित हुईं। ये क्लिनिकल लक्षण, हिस्टोलॉजी, डीआईएफ और जरूरत के अनुसार खून में एंटीबॉडी की जांच को साथ देखने का समर्थन करती हैं। बीमारी के फैलाव का स्पेशलिस्ट आकलन और ट्रीटमेंट की योजना भी जरूरी बताती हैं।

व्यावहारिक मतलब है: सही टिश्यू सैंपल लें, मजबूत शक होने पर नेगेटिव टेस्ट को सावधानी से समझें, और आंख या सांस के रास्ते का खतरा जल्दी पहचानें। सैंपल के लिए संबंधित लैब की जरूरतें और स्थानीय रेफरल व्यवस्था सीधे पूछकर पक्की करें। यह लेख पहचान और रेफरल के बारे में है, दवा लिखने का प्रोटोकॉल नहीं।

Questions people ask

क्या पेम्फिगस सिर्फ मुंह से शुरू हो सकता है?

हां। त्वचा के घावों से पहले मुंह में छिले घाव आ सकते हैं और यही पहली परेशानी हो सकती है। बिना स्पष्ट कारण लगातार छिले घाव हों तो चेकअप और टिश्यू जांच जरूरी है, भले त्वचा सामान्य दिखे।

क्या लाल और छिलते गम्स का मतलब म्यूकस मेम्ब्रेन पेम्फिगॉइड है?

नहीं। डेस्क्वामेटिव जिंजिवाइटिस केवल लाल और छिलते गम्स का वर्णन है। म्यूकस मेम्ब्रेन पेम्फिगॉइड, पेम्फिगस और इरोसिव लाइकेन प्लेनस महत्वपूर्ण संभावनाएं हैं। सिर्फ देखकर इनके बीच भरोसेमंद फर्क नहीं किया जा सकता।

क्या रेफर करने से पहले साबुत छाला दिखने का इंतजार करें?

नहीं। मुंह के छाले अक्सर जल्दी फूट जाते हैं। लगातार छिले घाव, बार-बार परत छिलना या छाले होने की स्पष्ट हिस्ट्री, स्पेशलिस्ट चेकअप और योजनाबद्ध बायोप्सी के लिए पर्याप्त कारण हैं।

क्या एक बायोप्सी सैंपल से हिस्टोलॉजी और डीआईएफ दोनों हो सकते हैं?

आम तौर पर अलग सैंपल लिए जाते हैं, क्योंकि उन्हें संभालने की जरूरतें अलग हैं। सैंपल लेने से पहले लैब से व्यवस्था पक्की करें। यह न मानें कि सामान्य हिस्टोलॉजी के लिए सुरक्षित किया गया टिश्यू डीआईएफ के लिए भी ठीक होगा।

क्या डीआईएफ नेगेटिव हो तो ऑटोइम्यून छाले वाली बीमारी नहीं है?

नहीं। सैंपल की जगह, टिश्यू का नुकसान, उसे संभालने का तरीका और पिछला ट्रीटमेंट रिपोर्ट को प्रभावित कर सकते हैं। मजबूत क्लिनिकल शक हो तो स्पेशलिस्ट समीक्षा, लैब से चर्चा और दोबारा या दूसरी जगह से बायोप्सी पर विचार जरूरी है।

मुंह में पेम्फिगॉइड हो तो बिना आंख के लक्षण भी आंख का चेकअप चाहिए?

म्यूकस मेम्ब्रेन पेम्फिगॉइड का शक या पुष्टि होने पर आंख के स्पेशलिस्ट का चेकअप जरूरी है। शुरुआती असर के संकेत बहुत हल्के हो सकते हैं। नई लाली, दर्द, रोशनी से तकलीफ, किरकिराहट या नजर में बदलाव हो तो उसी दिन जरूरी चेकअप कराएं।

क्या मुंह की ऑटोइम्यून छाले वाली बीमारी में स्कैन जरूरी है?

आम तौर पर नहीं। इमेजिंग अलग दांत, जबड़े, गहरे टिश्यू या शरीर की किसी दूसरी समस्या के शक में की जाती है। सांस के रास्ते और निगलने के लक्षणों में संबंधित अंग की जांच चाहिए, न कि सामान्य डेंटल स्कैन।

क्या पहले से ऑटोइम्यून बीमारी हो तो एक जगह का पुराना अल्सर उसी का मान लें?

नहीं। दो हफ्ते से ज्यादा रहने वाला अल्सर, खासकर सख्ती, गांठ, सुन्नपन या बिना स्पष्ट वजह खून आने के साथ हो, तो अलग से सामने का चेकअप जरूरी है। पहले से ऑटोइम्यून बीमारी की पुष्टि होने पर भी कैंसर की संभावना खारिज नहीं होती।

This page is general information, not a diagnosis. A mouth problem needs to be looked at in person or on video before anyone can tell you what it is.