Oral Medicine for Doctors · 11 min read · हिन्दी

मुंह के कैंडिडा इन्फेक्शन को दूसरे पैच और घावों से कैसे अलग पहचानें?

ओरल कैंडिडायसिस, यानी मुंह के कैंडिडा फंगल इन्फेक्शन की पहचान के लिए पैच का रूप, हल्के से पोंछने पर उसका हटना, उसकी जगह और इन्फेक्शन का जोखिम बढ़ाने वाली स्थितियां साथ में देखें। सिर्फ पॉजिटिव स्वैब रिपोर्ट काफी नहीं है। पोंछने पर हटने वाली सफेद परत या इससे मेल खाते लाल पैच इस पहचान का समर्थन करते हैं। जो पैच बना रहे, पोंछने से न हटे, अल्सर जैसा हो, असामान्य रूप से सख्त हो या लाल-सफेद मिला हुआ हो, उसमें दूसरी बीमारियों की जांच जरूरी है। शक पैदा करने वाले संकेत हों तो बायोप्सी या तुरंत स्पेशलिस्ट रेफरल करें।

Written and medically reviewed by

Dr. Bipin R. Upadhyay

BDS · MDS Oral Medicine & Radiology · PhD Scholar · Associate Professor & Head, Department of Dentistry

Last clinically reviewed: 2026-11-03

Key points

  • कैंडिडायसिस की पहचान चेकअप के पैटर्न और मरीज की स्थिति से करें, सिर्फ पॉजिटिव स्वैब से नहीं।
  • हल्के से पोंछने पर परत हटना मददगार है, लेकिन इससे सभी गैर-गंभीर और चिंता वाले पैच भरोसे से अलग नहीं होते।
  • बने रहने वाले, पोंछने से न हटने वाले, एक जगह लाल, अल्सर जैसे या सख्त हिस्से में दूसरी बीमारियों और बायोप्सी की जरूरत पर विचार करें।
  • बिना जटिलता वाले सतही कैंडिडा इन्फेक्शन में इमेजिंग जरूरी नहीं है। किसी अलग मेडिकल वजह पर ही इसका इस्तेमाल करें।
  • शक वाला घाव पहचानते ही रेफर करें। दो हफ्ते से ज्यादा न भरने वाले अल्सर का दोबारा चेकअप करें।
  • केयर के बाद पैच या घाव का पूरी तरह ठीक होना पक्का करें। सिर्फ जलन कम होना काफी नहीं है।

ओरल कैंडिडायसिस की पहचान में चेकअप क्यों जरूरी है?

ओरल कैंडिडायसिस में कैंडिडा नाम का यीस्ट, यानी एक तरह का फंगस, मुंह की अंदरूनी परत में बीमारी पैदा करता है। कैंडिडा बिना बीमारी किए भी मुंह में रह सकता है। इसे कॉलोनाइजेशन कहते हैं। इसलिए कल्चर, यानी सैंपल में फंगस उगाकर की गई जांच, पॉजिटिव आने से यह साबित नहीं होता कि पैच, दर्द या जलन की वजह कैंडिडा ही है।

सही पहचान के लिए चेकअप, लक्षण और मरीज की बाकी स्थिति का आपस में मेल होना चाहिए। आम तौर पर दिखने वाला पैटर्न हो तो लैब जांच के बिना भी पहचान हो सकती है। पैटर्न अलग हो, बीमारी बार-बार हो या ठीक न हो रही हो, तो एक ही अनुमान दोहराने के बजाय पहचान पर फिर से विचार करें।

दो सवाल अलग रखें: क्या कैंडिडा की भूमिका है, और क्या उसके नीचे कोई दूसरा पैच या घाव भी है? कैंडिडा के साथ सूजन वाली बीमारी, सतह के टिशू में असामान्य बदलाव या कैंसर भी हो सकता है। कैंडिडा मिलना या डॉक्टर की देखरेख में एंटीफंगल केयर, यानी फंगस के खिलाफ ट्रीटमेंट, से सुधार होना किसी अलग, बने रहने वाले घाव को खारिज नहीं करता।

  • पहचान का समर्थन करने वाले संकेत: पोंछने पर हटने वाली परत, उससे मेल खाती लालिमा, दर्द या छिलने जैसा एहसास, स्वाद में बदलाव और जोखिम बढ़ाने वाली स्थितियां।
  • दूसरी वजह तलाशने वाले संकेत: एक जगह सख्त पैच या गांठ, बना रहने वाला अल्सर, टिशू का नष्ट होना, महसूस करने की क्षमता में बदलाव या गर्दन में बिना साफ वजह की गांठ।
  • सावधानी: सिर्फ जलन, सिर्फ जीभ पर परत या सिर्फ पॉजिटिव स्वैब रिपोर्ट पहचान के लिए काफी नहीं है।

मुंह में कैंडिडा इन्फेक्शन कैसा दिख सकता है?

स्यूडोमेम्ब्रेनस कैंडिडायसिस में मुलायम सफेद या क्रीम रंग की परत बनती है। यह आम तौर पर पोंछने से हट जाती है और नीचे लाल सतह दिखती है। एरिथेमेटस कैंडिडायसिस में मुख्य रूप से लालिमा होती है। कभी जीभ की सतह के छोटे उभार भी कम हो जाते हैं। इनमें से कोई भी रूप सिर्फ कैंडिडा में ही नहीं दिखता।

क्रॉनिक हाइपरप्लास्टिक कैंडिडायसिस में लंबे समय से चिपका हुआ सफेद पैच होता है, जो पोंछने से नहीं हटता। सिर्फ देखकर इसे दूसरे बने रहने वाले सफेद पैच से सुरक्षित तरीके से अलग नहीं किया जा सकता। अक्सर स्पेशलिस्ट चेकअप और टिशू की जांच जरूरी होती है।

  • हटने वाली परत: सिर्फ जीभ न देखें। गालों के अंदर, तालू, जीभ और बाकी जगहों का भी चेकअप करें।
  • लाल जीभ या तालू: लक्षण, स्थानीय रगड़ या जलन, लार और किसी दूसरी बीमारी से मेल खाते पैटर्न को जांचें।
  • डेंचर से जुड़ी सूजन: डेंचर, यानी निकालकर लगाए जाने वाले नकली दांत, के नीचे की लालिमा अक्सर उसके आकार के अनुसार होती है। लेकिन दबाव, सफाई और दूसरी वजहें भी देखें।
  • एंगुलर कीलाइटिस: मुंह के कोनों में सूजन और दरारों में कैंडिडा की भूमिका हो सकती है। वहां लार जमा होना, खिंचाव या रगड़ और दूसरे इन्फेक्शन भी वजह हो सकते हैं।
  • मीडियन रॉम्बॉइड ग्लोसाइटिस: जीभ के पीछे, बीच की लाइन के पास चिकना लाल हिस्सा कैंडिडा से जुड़ा हो सकता है। अकेले इस संकेत से पहचान नहीं होती।

मरीज की हिस्ट्री में क्या पूछें?

पूछें कि समस्या कब शुरू हुई, कैसे बदली, पहले भी हुई थी या नहीं, और पैच जगह बदलता है या एक ही जगह रहता है। दर्द, जलन, स्वाद में बदलाव, निगलने में दिक्कत और निगलते समय दर्द के बारे में पूछें। पुराने फोटो से जगह बदलने वाले जीभ के पैटर्न और एक जगह बने रहने वाले पैच में फर्क समझने में मदद मिल सकती है।

डॉक्टर की सलाह से और बिना सलाह लिए गए सभी ट्रीटमेंट की जानकारी लें। पहले से यह न मानें कि समस्या उन्हीं से हुई है। डायबिटीज, शरीर की रोगों से लड़ने की क्षमता कम होना, कैंसर केयर, हाल की बीमारी, पोषण की कमी और मुंह सूखने के बारे में पूछें। मेडिकल जांच हिस्ट्री और चेकअप के आधार पर चुनें, सबके लिए एक जैसा बड़ा जांच पैनल न लिखें।

  • मुंह से जुड़े कारण: डेंचर, किसी डेंटल उपकरण की फिटिंग, रात में डेंचर पहनना, मुंह की सफाई, चोट और लार कम बनना।
  • आदतें और संपर्क: तंबाकू, सुपारी, शराब और हाल में इस्तेमाल हुए ऐसे ओरल प्रोडक्ट जिनसे जलन हो सकती है।
  • शरीर की बीमारी के संकेत: बार-बार इन्फेक्शन, बिना साफ वजह वजन घटना, थकान या पहले से कम इम्यूनिटी, यानी रोगों से लड़ने की क्षमता।
  • पिछली केयर: क्या बीमारी की पहचान रिकॉर्ड में है, लक्षणों में सुधार हुआ था या नहीं, और असली पैच या घाव पूरी तरह गया था या नहीं।
  • जोखिम की जांच: गंभीर, बार-बार होने वाले या बिना साफ वजह के कैंडिडा इन्फेक्शन में मरीज की सहमति से इम्यूनिटी से जुड़ी बीमारी की जांच जरूरी हो सकती है।

मुंह का चेकअप किस क्रम में करें?

परत पोंछने से हटती है या नहीं, हिस्सा कितना सख्त है, घाव कितना गहरा है और गर्दन की ग्रंथियां कैसी हैं—यह देखने के लिए सामने बैठाकर चेकअप जरूरी है। फोटो या ऑनलाइन सलाह से इन बातों की भरोसेमंद जांच नहीं हो सकती। मरीज एक ही दर्द वाली जगह बताए, तब भी पूरा मुंह देखें।

पैच को छूने या पोंछने से पहले उसका रिकॉर्ड बनाएं। आसानी से पहुंच सकने वाले सफेद हिस्से को गीली गॉज, यानी मेडिकल जालीदार कपड़े, से हल्के से पोंछें। अल्सर या नाजुक सतह को जोर से न खुरचें। पोंछने के बाद क्या बचा, इसे लिखें। आगे का फैसला बचे हुए हिस्से के आधार पर होगा।

  • पहले मरीज की सामान्य हालत देखें: शरीर में पानी की कमी, बुखार, निगल पाने की क्षमता और सांस के रास्ते की कोई समस्या।
  • डेंचर निकालकर होंठ, मुंह के कोने, गालों के अंदर, गम्स, तालू, जीभ के नीचे का हिस्सा और जीभ की सभी सतहें देखें।
  • जगह, माप, रंग, सतह की बनावट, किनारे, फैलाव और दोनों तरफ एक जैसा पैटर्न है या नहीं, रिकॉर्ड करें।
  • हल्के से पोंछकर देखें। ऊपरी परत हटना तभी कैंडिडा का समर्थन करता है जब नीचे का रूप भी उससे मेल खाए।
  • हल्के से छूकर असामान्य सख्ती, नीचे के टिशू से चिपकाव और गहरी सूजन जांचें।
  • लार, डेंचर की फिटिंग, दांत से लगने वाली चोट, मुंह खुलना और गर्दन के लिम्फ नोड्स, यानी इम्यून सिस्टम से जुड़ी छोटी ग्रंथियां, जांचें।
  • सहमति लेकर फोटो लें। संभावित बीमारियां, दोबारा चेकअप की योजना और कब जल्दी मदद लेनी है, रिकॉर्ड करें।

दूसरे सफेद पैच को कैंडिडा से कैसे अलग पहचानें?

पोंछने से परत हटना मददगार संकेत है, लेकिन अपने आप में पक्का टेस्ट नहीं है। जमा मैल, खराब हुआ ऊपरी टिशू और अल्सर की ढकने वाली परत भी हट सकती है। दूसरी तरफ, कैंडिडा से जुड़ा चिपका हुआ पैच आम तौर पर हटने वाली थ्रश की परत जैसा नहीं होता। थ्रश मुंह के कैंडिडा इन्फेक्शन का आम नाम है।

पोंछने से न हटने वाले और बने रहने वाले पैच में कई दूसरी बीमारियों पर विचार जरूरी है। सिर्फ स्वैब में कैंडिडा मिलने या मरीज को डायबिटीज होने पर इसे कैंडिडायसिस न मानें।

  • जीभ पर जमा परत या मैल: जीभ की सतह पर पदार्थ जमा हो सकता है, बिना नीचे सूजन या मुंह की दूसरी जगह बीमारी के।
  • फ्रिक्शनल केराटोसिस: बार-बार रगड़ से सतह मोटी होना। अक्सर उसी जगह चोट या रगड़ का कारण मिलता है। कारण हटाने के बाद भी पैच रहे तो दोबारा जांच करें।
  • ल्यूकोप्लाकिया: मुख्य रूप से सफेद पैच, जिसकी जांच के बाद कोई दूसरी पहचानी हुई वजह न मिले। कोशिकाओं में असामान्य बदलाव देखने के लिए बायोप्सी, यानी टिशू का छोटा सैंपल लेकर जांच, जरूरी हो सकती है।
  • ओरल लाइकेन प्लेनस: मुंह की सूजन वाली बीमारी, जिसमें अक्सर दोनों तरफ जाली जैसी सफेद लाइनें होती हैं। साथ में लालिमा या ऊपरी सतह छिली हुई हो सकती है। कैंडिडा साथ मौजूद हो सकता है, लेकिन पूरे पैटर्न की वजह जरूरी नहीं है।
  • ओरल हेयरी ल्यूकोप्लाकिया: आम तौर पर जीभ के किनारों पर सिलवटों वाले सफेद पैच, जो पोंछने से नहीं हटते। खासकर कम इम्यूनिटी वाले मरीजों में दिख सकते हैं।
  • किसी पदार्थ से चोट या जलना: खराब हुई ऊपरी परत हट सकती है। संपर्क की हिस्ट्री, अचानक शुरुआत और प्रभावित जगहों का पैटर्न मदद करते हैं।
  • स्क्वैमस सेल कार्सिनोमा: सतह की परत की कोशिकाओं का कैंसर। यह सफेद, लाल-सफेद, अल्सर जैसा या मोटा हिस्सा दिख सकता है, खासकर सख्ती या नीचे चिपकाव के साथ।

लाल पैच, छिली सतह और अल्सर में क्या फर्क देखें?

कैंडिडा के लाल पैच को देखकर पहचानना, हटने वाली सफेद परत की तुलना में मुश्किल है। जगह, फैलाव, जोखिम और दूसरी संभावित वजहों पर ध्यान जरूरी है। एक जगह बना रहने वाला लाल पैच, खासकर जीभ के नीचे या जीभ के किनारे जैसी ज्यादा चिंता वाली जगह पर, बिना आगे जांच किए सिर्फ इन्फेक्शन मानकर ट्रीट न करें।

गहरे अल्सर, टिशू का ज्यादा नष्ट होना और अल्सर का सख्त किनारा सामान्य, बिना जटिलता वाले कैंडिडा इन्फेक्शन के संकेत नहीं हैं। कम इम्यूनिटी वाले मरीज में दूसरे इन्फेक्शन और कैंसर समेत ज्यादा संभावनाओं पर विचार करें।

  • जियोग्राफिक टंग: जीभ पर चिकने लाल हिस्से, जिनके आसपास हल्के रंग के घुमावदार किनारे हों। समय के साथ इनका आकार या जगह बदलती है।
  • एरिथ्रोप्लाकिया: ऐसा लाल पैच जिसकी कोई दूसरी साफ वजह न मिले। इसमें जल्द स्पेशलिस्ट चेकअप और आम तौर पर बायोप्सी जरूरी होती है।
  • इरोसिव लाइकेन प्लेनस: लाल या छिली हुई सतह के साथ दूसरी जगहों पर इस बीमारी की खास सफेद लाइनें।
  • ऑटोइम्यून छाले वाली बीमारी: शरीर का इम्यून सिस्टम अपने ही टिशू को नुकसान पहुंचाता है। नाजुक सतह, छिले हिस्से और गम्स की परत उतरना दिख सकता है। त्वचा, आंख या निजी अंगों के लक्षण भी संकेत दे सकते हैं।
  • पोषण की कमी या शरीर की दूसरी बीमारी: चिकनी और दर्द वाली जीभ में लक्षणों के हिसाब से मेडिकल जांच जरूरी हो सकती है।
  • चोट का अल्सर या बार-बार होने वाले एफ्थस अल्सर, यानी आम छाले: इनमें अलग-अलग जगह टिशू का घाव होता है, फैली हुई हटने वाली परत नहीं।
  • बर्निंग माउथ सिंड्रोम: लगातार जलन, लेकिन उसे समझाने वाला कोई दिखने वाला घाव नहीं। मुंह और शरीर की दूसरी वजहों को सही जांच से बाहर करने के बाद ही यह पहचान की जाती है।

फंगल सैंपल, कल्चर और दूसरी जांच कब करें?

रूप सामान्य न हो, पहचान में शक रहे, बीमारी बार-बार हो या डॉक्टर की देखरेख में सही केयर से ठीक न हो, तो फंगल सैंपल लेने पर विचार करें। डायरेक्ट माइक्रोस्कोपी में पैच से लिए पदार्थ को माइक्रोस्कोप में देखकर फंगस की बनावट खोजी जाती है। नतीजे तभी कैंडिडायसिस का समर्थन करते हैं जब वे चेकअप और लक्षणों से मेल खाएं।

कल्चर कैंडिडा की पहचान कर सकता है और ठीक न हो रही बीमारी की स्पेशलिस्ट जांच में मदद कर सकता है। लेकिन पॉजिटिव रिपोर्ट सिर्फ बिना बीमारी वाले कॉलोनाइजेशन की वजह से भी हो सकती है। सैंपल ठीक से न लिया गया हो या हाल के ट्रीटमेंट से नतीजे बदले हों, तो नेगेटिव रिपोर्ट भी बीमारी को भरोसे से खारिज नहीं करती।

मेडिकल जांच मरीज की स्थिति के अनुसार चुनें। जरूरत होने पर ब्लड शुगर के नियंत्रण, ब्लड सेल की गिनती या पोषण की स्थिति की जांच करें। बिना साफ वजह बार-बार बीमारी होने पर पूरी जानकारी देकर सहमति लें और उचित काउंसलिंग के साथ कम इम्यूनिटी की जांच पर विचार करें।

  • सैंपल सक्रिय पैच या घाव से लें, मुंह की किसी असंबंधित जगह से नहीं।
  • लैब को पैच का प्रकार, इम्यूनिटी से जुड़ी जरूरी जानकारी और हाल के ट्रीटमेंट की हिस्ट्री दें।
  • पॉजिटिव कल्चर की वजह से चेकअप में मिले शक वाले संकेतों को नजरअंदाज न करें।
  • हर न ठीक होने वाले पैच को ट्रीटमेंट के खिलाफ फंगस की प्रतिरोधक क्षमता से जोड़ने से पहले पहचान पर दोबारा विचार करें।

मुंह के पैच की बायोप्सी कब जरूरी है?

आम तरह की हटने वाली परत हो, मरीज की स्थिति उससे मेल खाए और वह पूरी तरह ठीक हो जाए, तो रूटीन बायोप्सी जरूरी नहीं है। डिस्प्लेसिया, यानी कोशिकाओं का असामान्य विकास, कैंसर या मुंह की परत की दूसरी बीमारी को बाहर करने के लिए टिशू की पहचान जरूरी हो, तो बायोप्सी अहम है।

अमेरिकन डेंटल एसोसिएशन की 2017 की गाइडलाइन उन मुंह के बदलावों पर है जिनमें कैंसर का जोखिम हो सकता है। यह चेकअप में शक वाले घाव की तुरंत बायोप्सी या स्पेशलिस्ट रेफरल का समर्थन करती है। पहले एंटीफंगल केयर आजमाने के कारण इस फैसले में देरी नहीं होनी चाहिए। घाव पहले से शक वाला दिखे तो दो हफ्ते इंतजार करना जरूरी नहीं है।

सही ट्रेनिंग वाला डॉक्टर बायोप्सी की जगह चुने और ओरल पैथोलॉजी, यानी मुंह के टिशू की लैब जांच करने वाली टीम, से तालमेल रखे। छाले वाली ऑटोइम्यून बीमारी का शक हो तो स्पेशलिस्ट की योजना जरूरी है। इम्यूनोफ्लोरेसेंस जांच टिशू से जुड़े इम्यून प्रोटीन पहचानती है और इसके लिए सैंपल की जगह, उसे रखने और भेजने का खास तरीका चाहिए।

  • बना रहने वाला, पोंछने से न हटने वाला पैच, बिना साफ वजह एक जगह लाल पैच या मिला हुआ लाल-सफेद पैच हो तो जल्द बायोप्सी करें या रेफर करें।
  • अल्सर के साथ सख्ती, नीचे चिपकाव, ऊंचा और टेढ़ा-मेढ़ा किनारा या बिना वजह ब्लीडिंग हो तो जांच जल्दी आगे बढ़ाएं।
  • हटने वाली परत साफ होने के बाद बचा कोई भी पैच या घाव दोबारा जांचें।
  • पैथोलॉजिस्ट को संभावित बीमारियां, उपलब्ध फोटो और फंगस की भूमिका की जांच का सवाल बताएं।
  • सैंपल में फंगस मिलना साथ में डिस्प्लेसिया या कैंसर न होने का सबूत नहीं है।

कैंडिडा इन्फेक्शन में एक्स-रे या स्कैन कब चाहिए?

मुंह की सिर्फ ऊपरी परत के कैंडिडा इन्फेक्शन में आम तौर पर इमेजिंग, यानी एक्स-रे या स्कैन, जरूरी नहीं है। डेंटल एक्स-रे और कोन-बीम कम्प्यूटेड टोमोग्राफी, यानी दांत और जबड़े का तीन आयामों वाला एक्स-रे, मुंह की परत के कैंडिडा इन्फेक्शन की पहचान नहीं करते। ये देखकर जांचने, छूकर जांचने या बायोप्सी का विकल्प नहीं हैं।

इमेजिंग तभी करें जब किसी दूसरे सवाल का जवाब चाहिए। गहरी सूजन, जबड़े तक बीमारी का शक, बिना वजह सुन्नपन, मुंह बहुत कम खुलना या गर्दन में गांठ हो तो सिर्फ मुंह की परत से आगे की जांच जरूरी हो सकती है।

जिस स्पेशलिस्ट को रेफर किया गया है, वह संभावित बीमारी के अनुसार स्कैन चुने। गर्दन की गांठ देखने में अल्ट्रासाउंड मदद कर सकता है। गहरी बीमारी में सीटी या एमआरआई, यानी शरीर के अंदर की विस्तृत तस्वीरों वाले स्कैन, उचित हो सकते हैं। निगलने के लक्षणों में इसके बजाय मेडिकल चेकअप और एंडोस्कोपी, यानी कैमरे से पाचन नली की जांच, जरूरी हो सकती है।

  • सिर्फ फंगल स्वैब पॉजिटिव होने पर इमेजिंग न कराएं।
  • रूटीन डेंटल एक्स-रे की व्यवस्था करते हुए मुंह के शक वाले पैच का रेफरल न रोकें।
  • गहरे इन्फेक्शन, अंदर के टिशू तक फैलती बीमारी या सांस के रास्ते में रुकावट का शक हो तो अस्पताल में जांच जरूरी है।

मरीज को कब और किस स्पेशलिस्ट के पास रेफर करें?

रेफरल कितनी जल्दी चाहिए, यह जोखिम से तय होता है, सिर्फ फंगल इन्फेक्शन का नाम देने से नहीं। चिंता वाले संकेत साफ लिखें और स्थानीय अर्जेंट रेफरल व्यवस्था इस्तेमाल करें। समय पर अपॉइंटमेंट मिलने में शक हो तो सिर्फ रूटीन अनुरोध भेजने के बजाय संबंधित टीम से सीधे संपर्क करें।

दो हफ्ते से ज्यादा न भरने वाले अल्सर का जल्द सामने बैठाकर दोबारा चेकअप जरूरी है। वजह साफ न हो या अल्सर बना रहे तो रेफर करें। गांठ, सुन्नपन, बिना वजह ब्लीडिंग, मुंह खोलने या निगलने में दिक्कत में भी सीधे चेकअप की जरूरत है। पर्याप्त जांच के बिना इन्हें थ्रश की वजह से हुआ न मानें।

  • अभी इमरजेंसी अस्पताल जांच: सांस लेने में दिक्कत, अपनी लार न निगल पाना, तेजी से फैलती सूजन, शरीर में पानी की गंभीर कमी या सेप्सिस का शक। सेप्सिस इन्फेक्शन पर शरीर की जानलेवा प्रतिक्रिया है।
  • उसी दिन मेडिकल या अस्पताल जांच: बहुत कम इम्यूनिटी वाले मरीज में नया निगलने का दर्द या दिक्कत, या मुंह की बीमारी के कारण पर्याप्त पानी न पी पाना।
  • कैंसर का शक होते ही अर्जेंट रेफरल शुरू करें: असामान्य सख्ती, नीचे चिपकाव, शक वाला लाल या लाल-सफेद बदलाव, मुंह या गर्दन में बिना साफ वजह गांठ या बना रहने वाला अस्पष्ट अल्सर। बायोप्सी की सुविधा वाली ओरल मेडिसिन टीम, मुंह और जबड़े के सर्जन या कान-नाक-गला/सिर-गर्दन कैंसर टीम को रेफर करें।
  • जल्द ओरल मेडिसिन रेफरल: असामान्य, बार-बार होने वाले, पोंछने से न हटने वाले या ठीक न होने वाले पैच; पहचान में शक; या साथ में सूजन वाली दूसरी बीमारी का शक। ओरल मेडिसिन मुंह की बीमारियों की पहचान और बिना सर्जरी वाली देखभाल की शाखा है।
  • फिजिशियन या संबंधित स्पेशलिस्ट रेफरल: शरीर की किसी बीमारी के नियंत्रण में न होने का शक, बिना साफ वजह कम इम्यूनिटी या खाने की नली तक बीमारी का शक। पाचन तंत्र या इन्फेक्शन के स्पेशलिस्ट की राय जरूरी हो सकती है।
  • रेफरल के साथ दें: समस्या कितने समय से है, घाव का माप, फोटो, छूकर जांच और गर्दन की ग्रंथियों के निष्कर्ष, जोखिम, जांच रिपोर्ट और पिछले ट्रीटमेंट से हुआ असर।

चेकअप के बाद केयर और फॉलो-अप कैसे करें?

लक्षण और चेकअप सामान्य, बिना जटिलता वाले कैंडिडा इन्फेक्शन से मेल खाते हों तो डेंटिस्ट या फिजिशियन अपनी देखरेख में एंटीफंगल केयर दे सकते हैं और योगदान देने वाले कारणों को संभाल सकते हैं। डेंचर से जुड़ी बीमारी में डेंटल टीम से फिटिंग की जांच और सफाई की मदद भी जरूरी है। शरीर की दूसरी बीमारी की भूमिका का शक हो तो इलाज कर रहे फिजिशियन से तालमेल रखें।

गंभीर, बार-बार होने वाली या ठीक न होने वाली बीमारी में बिना पुष्टि बार-बार ट्रीटमेंट देने के बजाय स्पेशलिस्ट चेकअप कराएं। मरीज की स्थिति के अनुसार दोबारा चेकअप की योजना रिकॉर्ड करें। यह पक्का करें कि पैच या घाव खुद ठीक हुआ है, सिर्फ परेशानी कम नहीं हुई है।

मुंबई और आसपास के इलाकों में रूटीन पहचान के लिए मरीज को ओरल मेडिसिन सेवा में रेफर किया जा सकता है। डॉ. बिपिन आर. उपाध्याय सायन के के.जे. सोमैया सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल की स्पेशल डेंटल ओपीडी और अंबरनाथ के रीजनबल स्माइल डेंटल क्लिनिक में प्रैक्टिस करते हैं। इमरजेंसी या कैंसर के शक वाले संकेतों में रूटीन क्लिनिक विजिट का इंतजार किए बिना सही अस्पताल सेवा तक पहुंचें।

  • केयर के मुख्य विकल्प: एंटीफंगल केयर, डेंचर केयर, स्थानीय रगड़ या जलन कम करना और योगदान देने वाली मेडिकल स्थितियों को संभालना।
  • एक जगह असामान्य हिस्सा बना रहे: संभावित बीमारियों पर दोबारा विचार करें और जरूरत के अनुसार बायोप्सी या स्पेशलिस्ट चेकअप कराएं।
  • जल्दी लौटने की सलाह: हिस्सा बढ़े, ब्लीडिंग हो, सुन्नपन या गांठ आए, या मुंह खोलने या निगलने में नई दिक्कत हो तो तय फॉलो-अप से पहले चेकअप कराएं।

यह जानकारी किन गाइडलाइन्स पर आधारित है?

इन्फेक्शस डिजीजेज सोसायटी ऑफ अमेरिका की कैंडिडायसिस के मैनेजमेंट पर 2016 की अपडेटेड क्लिनिकल प्रैक्टिस गाइडलाइन मुंह, गले और खाने की नली की बीमारी पहचानने और मरीज से जुड़े जोखिम समझने का आधार देती है। यह लेख उसी संदर्भ का इस्तेमाल करता है, दवाओं की सिफारिशें नहीं दोहराता।

अमेरिकन डेंटल एसोसिएशन की 2017 की सबूत-आधारित गाइडलाइन मुंह में कैंसर का जोखिम रखने वाले बदलावों की जांच पर है। यह शक वाले घाव में बायोप्सी या तुरंत रेफरल का समर्थन करती है। कैंसर की चिंता हो तो फंगल टेस्ट टिशू जांच का विकल्प नहीं है।

नाइस गाइडलाइन एनजी12, जो संदिग्ध कैंसर की पहचान और रेफरल पर है, अपनी रेफरल सलाह में तीन हफ्ते से ज्यादा बने रहने वाले, बिना साफ वजह के मुंह के अल्सर और मुंह या गर्दन के चिंता वाले संकेत शामिल करती है। यहां दिया गया दो हफ्ते में न भरने वाले अल्सर के चेकअप का समय पहले सावधानी बरतने के लिए है। यह नाइस के अल्सर की अवधि वाले नियम का उद्धरण नहीं है। भारत में स्थानीय रेफरल व्यवस्थाएं अलग हो सकती हैं, लेकिन शक वाले घाव पर पहचान होते ही कदम उठाना चाहिए।

  • गाइडलाइन का सिद्धांत: मरीज और घाव की जांच करें, सिर्फ कल्चर रिपोर्ट को अलग से न देखें।
  • गाइडलाइन का सिद्धांत: अनुमानित इन्फेक्शन की जांच या ट्रीटमेंट करते हुए कैंसर की जांच में देरी न करें।
  • स्थानीय सेवाओं की उपलब्धता और मौजूदा गाइडलाइन्स के अनुसार रेफरल करें।

Questions people ask

पोंछने से हटने वाला सफेद पैच क्या हमेशा थ्रश होता है?

नहीं। जमा मैल, किसी पदार्थ से हुई चोट और खराब हुई ऊपरी परत भी हट सकती है। कैंडिडायसिस का समर्थन तब होता है जब परत का पैटर्न, नीचे की लाल या सूजी हुई सतह और मरीज की बाकी स्थिति उससे मेल खाएं। हल्के से पोंछने के बाद बची सतह जरूर देखें।

क्या कैंडिडा में ऐसा पैच हो सकता है जो पोंछने से न हटे?

हां। क्रॉनिक हाइपरप्लास्टिक कैंडिडायसिस में चिपके हुए पैच हो सकते हैं। लेकिन न हटने वाले पैच में दूसरी सफेद पैच वाली बीमारियों की जांच जरूरी है और बायोप्सी की जरूरत हो सकती है। फंगल कल्चर पॉजिटिव होने से यह जरूरत खत्म नहीं होती।

क्या कैंडिडा स्वैब पॉजिटिव होने से बीमारी पक्की हो जाती है?

नहीं। कैंडिडा स्वस्थ मुंह में बिना बीमारी किए रह सकता है। रिपोर्ट को लक्षणों, पैच के रूप और जोखिम के साथ समझें। एक जगह बना रहने वाला असामान्य हिस्सा अपनी अलग जांच मांगता है, चाहे कैंडिडा मिला हो।

क्या कैंडिडा इन्फेक्शन और मुंह का कैंसर साथ हो सकते हैं?

हां। कैंडिडा किसी अलग घाव पर मौजूद हो सकता है, कैंसर वाले टिशू पर भी। सख्ती, नीचे चिपकाव, बना रहने वाला अल्सर, बिना वजह ब्लीडिंग या शक वाला लाल-सफेद पैच हो तो फंगल रिपोर्ट चाहे जो हो, अर्जेंट जांच जरूरी है।

क्या कैंडिडा के हर संदिग्ध केस में कल्चर जरूरी है?

नहीं। आम तरह के लक्षण और चेकअप में लैब पुष्टि जरूरी नहीं हो सकती। पैटर्न अलग हो, पहचान में शक हो, बीमारी बार-बार हो या सही केयर से ठीक न हुई हो, तो सैंपल जांच ज्यादा मददगार है।

शक वाले पैच को रेफर करने से पहले एंटीफंगल केयर आजमाएं?

अगर इससे बायोप्सी या अर्जेंट स्पेशलिस्ट चेकअप में देरी होगी, तो नहीं। शक वाले संकेत मिलते ही कदम उठाना चाहिए। साथ मौजूद कैंडिडा की केयर, नीचे के घाव की जांच के साथ की जा सकती है—उसकी जगह नहीं।

निगलने में दिक्कत का मतलब क्या इन्फेक्शन फैल गया है?

जरूरी नहीं। निगलने में दिक्कत की कई वजहें हैं। कम इम्यूनिटी वाले मरीज में निगलने में दर्द या दिक्कत हो तो खाने की नली की बीमारी की संभावना के लिए जल्द मेडिकल चेकअप जरूरी है। अपनी लार न निगल पाना या सांस लेने में दिक्कत हो तो इमरजेंसी केयर चाहिए।

जलन कम हो गई लेकिन सफेद पैच बना है, तो क्या करें?

बचे हुए पैच का दोबारा चेकअप करें। लक्षण कम होने से यह साबित नहीं होता कि पूरे पैच की वजह सिर्फ कैंडिडा थी। बना रहने वाला, पोंछने से न हटने वाला, लाल-सफेद, अल्सर जैसा या सख्त हिस्सा हो तो स्पेशलिस्ट जांच और जरूरत के अनुसार बायोप्सी जरूरी है।

This page is general information, not a diagnosis. A mouth problem needs to be looked at in person or on video before anyone can tell you what it is.