Oral Medicine for Doctors · 11 min read · हिन्दी

दांतों के पैनोरमिक एक्स-रे की ओरल रेडियोलॉजिस्ट रिपोर्ट कब चाहिए?

दांतों के पैनोरमिक एक्स-रे की स्पेशलिस्ट रिपोर्ट तब चाहिए, जब उसमें दिख रहे बदलाव स्पष्ट न हों, गंभीर हो सकते हों, रिपोर्ट पढ़ने वाले डॉक्टर की ट्रेनिंग और क्षमता से बाहर हों या मरीज के चेकअप से मेल न खाते हों। हर इमेज में दिख रहे पूरे हिस्से का आकलन करके उसे लिखित रूप में दर्ज करना जरूरी है। जबड़े में बिना स्पष्ट वजह का असामान्य हिस्सा, हड्डी का नष्ट होना, नस की नली में बदलाव या जटिल सर्जरी की प्लानिंग में ओरल रेडियोलॉजिस्ट की राय खास तौर पर जरूरी है।

Written and medically reviewed by

Dr. Bipin R. Upadhyay

BDS · MDS Oral Medicine & Radiology · PhD Scholar · Associate Professor & Head, Department of Dentistry

Last clinically reviewed: 2026-11-01

Key points

  • हर पैनोरमिक इमेज की लिखित व्याख्या जरूरी है; हर रूटीन इमेज की अलग स्पेशलिस्ट रिपोर्ट जरूरी हो, ऐसा नहीं है।
  • अस्पष्ट, हड्डी नष्ट करने वाले, अनपेक्षित या चेकअप से मेल न खाने वाले बदलावों पर ओरल रेडियोलॉजी की राय लें।
  • सामान्य ओपीजी मुंह की अंदरूनी परत की बीमारी को नहीं नकारता और खतरे के लक्षणों को नजरअंदाज करने की वजह नहीं है।
  • आगे की इमेजिंग किसी स्पष्ट सवाल का जवाब देने के लिए हो, सिर्फ संयोग से मिले बदलाव के कारण अपने-आप नहीं।
  • रूटीन रिपोर्ट के इंतजार में जरूरी तुरंत जांच और रेफरल में देरी न करें।
  • रिजल्ट बताने और आगे का रेफरल पूरा कराने की जिम्मेदारी तय करें।

क्या हर पैनोरमिक एक्स-रे की अलग स्पेशलिस्ट रिपोर्ट चाहिए?

पैनोरमिक एक्स-रे, जिसे ऑर्थोपैंटोमोग्राम या ओपीजी भी कहते हैं, दांतों, जबड़ों और आसपास के हिस्सों की दो-आयामी तस्वीर है। इसमें लंबाई और चौड़ाई दिखती है, गहराई अलग से नहीं दिखती। हर जांच के लिए मरीज की स्थिति का सही आकलन और इमेज की लिखित व्याख्या जरूरी है। इसका मतलब यह नहीं कि हर रूटीन ओपीजी की अलग से स्पेशलिस्ट रिपोर्ट बनवानी ही होगी।

सही ट्रेनिंग वाला डेंटिस्ट अपनी क्षमता के दायरे में किसी सामान्य, स्पष्ट इमेज को समझ सकता है। लागू नियम और अस्पताल या क्लिनिक की शर्तें भी माननी होंगी। ओरल और मैक्सिलोफेशियल रेडियोलॉजिस्ट मुंह, जबड़े और चेहरे की इमेज समझने वाला स्पेशलिस्ट होता है। जब किसी अस्पष्ट बदलाव से बीमारी की पहचान, रेफरल या ट्रीटमेंट बदल सकता हो, तो उसकी राय लें।

ओपीजी पाने वाले फिजिशियन को यह नहीं मानना चाहिए कि एक्स-रे लेने के साथ उसकी रिपोर्ट भी बन चुकी है। पता करें कि इमेज किसने देखी है। अगर उसे समझना फिजिशियन की ट्रेनिंग और क्षमता से बाहर है, तो डेंटिस्ट या ओरल रेडियोलॉजिस्ट से आकलन कराएं। इस लेख को पूरे भारत में लागू किसी एक कानूनी रिपोर्टिंग नियम का बयान न मानें।

  • एक्स-रे की वजह, इमेज की जांच के लिए उपयोगिता, जरूरी बदलाव, निष्कर्ष और अगला कदम दर्ज करें।
  • पूरा दिखाई देने वाला हिस्सा देखें, सिर्फ रेफरल में बताए गए दांत को नहीं।
  • स्पेशलिस्ट रिपोर्ट सामने बैठकर किए गए चेकअप में मदद करती है; उसकी जगह नहीं लेती।
  • रेफर करने वाले डॉक्टर को सुनिश्चित करना चाहिए कि रिपोर्ट पढ़ी गई है और उसके अनुसार कदम उठाया गया है।

ओपीजी में कौन से बदलाव दिखें तो ओरल रेडियोलॉजिस्ट की रिपोर्ट लें?

अगर बिना स्पष्ट वजह का कोई बदलाव पहले से तय, गैर-इमरजेंसी प्रक्रिया को बदल सकता है, तो प्रक्रिया से पहले स्पेशलिस्ट से इमेज समझवाएं। ऐसा तब हो सकता है जब असामान्य हिस्से की शुरुआत स्पष्ट न हो, सामान्य बनावट बीमारी जैसी दिख रही हो या बीमारी दांत से होने वाली समस्या की अपेक्षित सीमा से आगे फैली हो।

दर्द न होने से यह साबित नहीं होता कि असामान्य हिस्सा नुकसानरहित है। दूसरी ओर, अलग दिखने वाली हर चीज बीमारी नहीं होती। एक्स-रे के समय गलत पोजिशन, हिस्सों का एक-दूसरे पर दिखना और उसी बनावट की दूसरी जगह पड़ी दोहरी परछाईं भी बीमारी जैसी लग सकती है।

  • बिना स्पष्ट वजह का रेडियोल्यूसेंट यानी ज्यादा गहरा हिस्सा, या रेडियोओपेक यानी ज्यादा सफेद हिस्सा।
  • गहरे और सफेद रंग का मिला-जुला असामान्य हिस्सा, कई ऐसे हिस्से या तुलना लायक पुराने एक्स-रे के मुकाबले बदला हुआ हिस्सा।
  • धुंधली या अस्पष्ट सीमा के साथ हड्डी का नष्ट होना, हड्डी की बाहरी सीमा में टूटन या असामान्य हड्डी के बीच फ्रैक्चर जैसा दिखना।
  • बिना स्पष्ट वजह दांत की जड़ का घुलना, यानी जड़ का हिस्सा कम होना, या दांत का अपनी जगह से खिसकना।
  • मैंडिबुलर कैनाल, यानी निचले जबड़े की नस वाली नली, का बिना स्पष्ट वजह चौड़ा होना, खिसकना या उसकी सीमा न दिखना।
  • साइनस यानी नाक के आसपास की हवा वाली जगह, जबड़े के जोड़ या निचले जबड़े की किनारी के पास ऐसा असामान्य हिस्सा जिसकी पूरी सीमा साफ न हो।
  • नरम टिश्यू में अनपेक्षित कैल्शियम जमाव या दोनों तरफ की बनावट में ऐसा अंतर जिसे भरोसे के साथ समझाया न जा सके।
  • ओपीजी सामान्य दिखने के बावजूद लक्षणों या चेकअप में मिले बदलावों की वजह स्पष्ट न होना।

एक्स-रे देखने के साथ मरीज का क्या चेकअप जरूरी है?

पहले यह तय करें कि जांच से किस सवाल का जवाब चाहिए। एक्स-रे देखकर पहले से बीमारी मानकर न चलें। लक्षण की जगह, शुरुआत, बढ़ने का तरीका और चबाने या दांतों के ट्रीटमेंट से उसका संबंध जानें। चोट, पहले हुई जबड़े की बीमारी, कैंसर का इतिहास, शरीर की दूसरी बीमारियों, तंबाकू और सुपारी के इस्तेमाल के बारे में पूछें।

मुंह की अंदरूनी परत, दांत, गम्स, जबड़े का आकार और गर्दन जांचें। सूजन, छूने पर दर्द, दांत हिलना, संवेदना में बदलाव और मुंह कम खुलना दर्ज करें। दांत से जुड़ी वजह का शक हो तो दांत के जरूरी टेस्ट भी करें। सिर्फ इमेज पर भरोसा न करें।

दो हफ्ते से ज्यादा समय तक न भरने वाले अल्सर, यानी मुंह के छाले या घाव, की सामने बैठकर जांच जरूरी है, भले ही ओपीजी सामान्य दिखे। गांठ, सुन्नपन, बिना स्पष्ट वजह खून आना, मुंह खोलने या निगलने में दिक्कत की भी सीधे जांच जरूरी है। इमेजिंग से मुंह की अंदरूनी परत की गंभीर बीमारी को नकारा नहीं जा सकता।

  • पुष्टि करें कि इमेज में संदिग्ध हिस्सा चेकअप में मिले बदलाव की जगह से मेल खाता है या नहीं।
  • दर्ज करें कि सूजन सख्त है या नरम, अपनी जगह चिपकी है, बढ़ रही है या उसके साथ गर्दन में गांठ है।
  • निचले होंठ या ठुड्डी में सुन्नपन हो तो दोनों तरफ की संवेदना की तुलना करें।
  • पहले हुई प्रक्रियाएं दर्ज करें और उपलब्ध हों तो पुरानी इमेज लें।
  • जरूरी लक्षण या संकेत न मिलने की जानकारी भी दें, सिर्फ मिले हुए बदलावों की नहीं।

पूरी पैनोरमिक इमेज को कैसे जांचें?

पहले मरीज की पहचान, जांच की तारीख, दाईं-बाईं तरफ के निशान और इमेज में आए हिस्सों की पुष्टि करें। देखें कि हिलने, गलत पोजिशन, एक्स-रे एक्सपोजर या एक-दूसरे पर पड़ती परछाइयों से इमेज प्रभावित तो नहीं हुई। जो हिस्सा ठीक से नहीं दिख रहा, उसे सामान्य लिखने के बजाय यह सीमा साफ बताएं।

हर बार एक तय क्रम में इमेज देखें, ताकि साफ दिख रही दांत की समस्या के कारण दूसरा असामान्य हिस्सा नजरअंदाज न हो। पैनोरमिक इमेज में अलग-अलग हिस्से अलग अनुपात में बड़े या बदले आकार के दिख सकते हैं। इसलिए आकार और दोनों तरफ के अंतर को सावधानी से समझें।

अगर उपलब्ध इमेज से जांच के सवाल का जवाब नहीं मिलता, तो दोबारा एक्स-रे कराने से पहले मूल इमेज फाइल की समीक्षा कराएं। दोबारा इमेजिंग किसी स्पष्ट जांच की जरूरत के लिए होनी चाहिए, सिर्फ ज्यादा सुंदर तस्वीर बनाने के लिए नहीं।

  • निचले जबड़े की किनारी को पूरा देखें। उसके मुख्य हिस्से, कोनों, ऊपर उठते हिस्सों और जोड़ के सिरों का आकलन करें।
  • निचले जबड़े की नस वाली नलियां और मेंटल फोरामिना देखें। ये प्रीमोलर, यानी कैनाइन और पीछे की बड़ी दाढ़ों के बीच वाले दांतों के पास नस के निकलने के सामान्य छेद हैं।
  • दांत, जड़ें, दांतों को सहारा देने वाली हड्डी, अभी बाहर न आए दांत और जड़ों के सिरे देखें।
  • ऊपरी जबड़े और दिखाई दे रही साइनस की सीमाओं को देखें।
  • दिख रहे नरम टिश्यू और गर्दन के हिस्सों में अनपेक्षित बदलाव जांचें।
  • पुरानी इमेज से तुलना करते समय पोजिशन और तकनीक के अंतर का ध्यान रखें।

कौन सी संभावित बीमारियों में खास सावधानी चाहिए?

डिफरेंशियल डायग्नोसिस का मतलब है उपलब्ध जानकारी के आधार पर संभावित वजहों की सूची। इसे असामान्य हिस्से की जगह, सीमा, अंदरूनी बनावट और आसपास के हिस्सों पर असर देखकर बनाएं। इमेजिंग से संभावनाएं कम की जा सकती हैं, लेकिन जबड़े की कई समस्याओं की भरोसेमंद पहचान सिर्फ ओपीजी से नहीं हो सकती।

जड़ के सिरे पर गहरा हिस्सा दांत से जुड़ी सूजन की वजह से हो सकता है। लेकिन कोई अलग समस्या या सामान्य बनावट भी जड़ के ऊपर दिखाई दे सकती है। दांत की सीधे जांच करें। सिर्फ पास में गहरा हिस्सा दिखने के कारण ऐसा ट्रीटमेंट न करें जिसे बाद में वापस न बदला जा सके।

अस्पष्ट सीमा के साथ हड्डी नष्ट होना इन्फेक्शन या कैंसर में हो सकता है। कई असामान्य हिस्से शरीर की किसी बीमारी या अलग-अलग स्थानीय समस्याओं से जुड़े हो सकते हैं। स्पेशलिस्ट रिपोर्ट में अनिश्चितता साफ होनी चाहिए और अगला फैसला बताया जाना चाहिए। बिना प्राथमिकता और आगे की दिशा वाली लंबी सूची देना पर्याप्त नहीं है।

  • दांत से जुड़े गहरे हिस्से: सूजन से जुड़ी बीमारी, सिस्ट यानी तरल या दूसरे पदार्थ वाली थैली, और दांत से अलग वजहों पर विचार करें।
  • बाहर न आए दांत के आसपास बदलाव: सामान्य आसपास की जगह और सिस्ट या ट्यूमर से बढ़ी जगह में अंतर करें। ट्यूमर टिश्यू की असामान्य बढ़त है; हर ट्यूमर कैंसर नहीं होता।
  • मिले-जुले या ज्यादा सफेद हिस्से: हड्डी के विकास से जुड़े बदलाव, सूजन और नई हड्डी बनाने वाली समस्याओं पर विचार करें।
  • हड्डी की बनावट में बड़े क्षेत्र में बदलाव: मरीज का इतिहास समर्थन करे तो शरीर के मेटाबॉलिज्म, यानी पदार्थों को बनाने और इस्तेमाल करने की प्रक्रियाओं, या दूसरी शारीरिक बीमारियों पर विचार करें।
  • जबड़े के जोड़ के सिरों में बदलाव: चोट, घिसाव और जोड़ों में सूजन के लक्षणों से मिलाकर देखें।
  • खून की नली में कैल्शियम जमने का शक: संबंधित मेडिकल जांच की सलाह लें। ओपीजी से धमनी कितनी संकरी है, यह पता नहीं लगाया जा सकता।

ओपीजी के बाद और इमेजिंग कब जरूरी है?

आगे की इमेजिंग तब सही है जब वह ऐसे अनसुलझे सवाल का जवाब दे जिससे देखभाल बदलती हो। ओरल रेडियोलॉजिस्ट की रिपोर्ट का मतलब अपने-आप एक और स्कैन नहीं है। कभी सीधे टेस्ट, किसी छोटे हिस्से का डेंटल एक्स-रे या पुरानी इमेज से तुलना ही अस्पष्टता दूर कर देती है।

कोन-बीम कंप्यूटेड टोमोग्राफी या सीबीसीटी तीन-आयामी इमेज बनाता है, जिसमें गहराई भी समझी जा सकती है। यह दांतों और हड्डी के लिए खास उपयोगी है। जब दो-आयामी इमेज पर्याप्त न हो, तो इससे समस्या का फैलाव, हड्डी की दीवार पर असर या नस की नली से संबंध स्पष्ट हो सकता है। जांच वाले हिस्से का आकार और तकनीक सवाल के अनुसार चुनें।

सीबीसीटी में नरम टिश्यू का आकलन सीमित होता है। कैंसर, गहरे हिस्सों में इन्फेक्शन या चेहरे की जटिल चोट के शक में अस्पताल में कंप्यूटेड टोमोग्राफी यानी सीटी और/या मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग यानी एमआरआई की जरूरत हो सकती है। एमआरआई नरम टिश्यू, हड्डी के अंदर की मज्जा, नस और जबड़े के जोड़ से जुड़े कुछ सवालों में उपयोगी है। मरीज को देखने वाली अगली टीम को जांच का चुनाव तय करने में मार्गदर्शन देना चाहिए।

  • जड़ के सिरे या दांत को सहारा देने वाली हड्डी की बारीक जानकारी के लिए मुंह के अंदर लिया जाने वाला सीमित हिस्से का एक्स-रे इस्तेमाल करें।
  • जब हड्डी की तीन-आयामी जानकारी से सर्जरी या बीमारी की पहचान का फैसला बदले, तब सीबीसीटी पर विचार करें।
  • इम्प्लांट के लिए हड्डी को अलग-अलग कटाव में दिखाने वाली इमेजिंग की जरूरत मौजूदा इम्प्लांट-इमेजिंग गाइडलाइन और तय प्रक्रिया के अनुसार जांचें।
  • हर फंसे हुए दांत या संयोग से मिले बदलाव के लिए रूटीन में सीबीसीटी न लिखें।
  • सुनिश्चित करें कि सीबीसीटी में रिकॉर्ड हुए पूरे तीन-आयामी हिस्से को उसे समझने की क्षमता वाला व्यक्ति जांचे।

कब इमरजेंसी, जल्दी या प्लान करके रेफर करें?

मरीज की स्थिति का खतरा तय करता है कि कितनी जल्दी देखभाल चाहिए। लिखित रिपोर्ट लेने के लिए इमरजेंसी देखभाल में देरी नहीं होनी चाहिए। नीचे दिए रास्ते प्राथमिकता तय करने की व्यावहारिक सलाह हैं, तय समय में अपॉइंटमेंट मिलने की गारंटी नहीं। स्थानीय अस्पताल की व्यवस्था अपनाएं और गंभीर बीमारी का शक हो तो टीम से सीधे बात करें।

मुंह के संदिग्ध घाव और जबड़े के संदिग्ध हिस्से की जांच अलग हो सकती है। लेकिन दोनों के लिए यह स्पष्ट होना चाहिए कि कौन सी टीम मरीज को देखेगी। जब मुख्य जरूरत जल्दी सामने बैठकर जांच की हो, तो मरीज को सिर्फ एक और इमेज के लिए न भेजें।

  • अभी इमरजेंसी जांच: सांस लेने में दिक्कत, लार भी न निगल पाना, चेहरे या गर्दन में तेजी से फैलती सूजन, न रुकने वाला खून या चेहरे की बड़ी चोट। ऐसे इमरजेंसी विभाग में भेजें जहां मुंह, जबड़े और चेहरे की सर्जरी या संबंधित सर्जिकल मदद उपलब्ध हो।
  • रूटीन रिपोर्ट का इंतजार किए बिना तुरंत स्पेशलिस्ट से संपर्क: निचले होंठ या ठुड्डी में नया और बिना स्पष्ट वजह का सुन्नपन, तेजी से बढ़ती जबड़े की सूजन, हड्डी नष्ट होने के बदलाव या असामान्य हड्डी में फ्रैक्चर का शक। ओरल और मैक्सिलोफेशियल सर्जरी टीम से संपर्क करें और साथ-साथ रेडियोलॉजी की राय की व्यवस्था करें।
  • कैंसर के शक में जल्द आकलन: दो हफ्ते से ज्यादा न भरने वाला अल्सर, लगातार बनी बिना स्पष्ट वजह की गांठ, बिना स्पष्ट वजह खून आना या मुंह खोलने अथवा निगलने में बढ़ती दिक्कत। स्थिति के अनुसार ओरल मेडिसिन, ओरल और मैक्सिलोफेशियल सर्जरी या सिर-गर्दन की कैंसर टीम को रेफर करें।
  • गैर-इमरजेंसी ट्रीटमेंट से पहले प्लान करके स्पेशलिस्ट रिपोर्ट: स्थिर लेकिन बिना स्पष्ट वजह के असामान्य हिस्से, आसपास की बनावट से अस्पष्ट संबंध या ऐसे बदलाव जिनसे सर्जरी का फैसला बदल सकता हो।
  • लिखित रिकॉर्ड के साथ निगरानी: पर्याप्त जांच के बाद ही, जब बदलाव निगरानी के लिए उपयुक्त हो। जिम्मेदार डॉक्टर और मरीज के अनुसार तय रिव्यू प्लान होना जरूरी है।

बायोप्सी कब चाहिए और समस्या किस स्पेशलिस्ट को दिखाएं?

बायोप्सी में टिश्यू का नमूना लेकर माइक्रोस्कोप से जांच की जाती है। कोई असामान्य हिस्सा समझ में न आए, चेकअप या इमेज में संदिग्ध संकेत हों, वह बढ़ रहा हो या देखभाल तय करने के लिए टिश्यू की जांच जरूरी हो, तो बायोप्सी के लिए स्पेशलिस्ट आकलन पर विचार करें। रेडियोलॉजी रिपोर्ट बायोप्सी सुझा सकती है, लेकिन वह मरीज की जांच के आधार पर होने वाली प्लानिंग की जगह नहीं लेती।

हड्डी में संयोग से दिखने वाले हर बदलाव की बायोप्सी जरूरी नहीं। कुछ की बनावट साफ तौर पर बिनाइन, यानी गैर-कैंसर वाली, होती है। चेकअप से मिलान के बाद उन्हें बिना सर्जरी के संभाला जा सकता है। चेकअप और इमेज के नतीजे अलग हों तो दोबारा आकलन करें। किसी एक के सामान्य होने पर अकेले भरोसा न करें।

खून की नसों से जुड़ी समस्या का शक हो तो बिना प्लानिंग क्लिनिक में बायोप्सी न करें। असामान्य खून आना, धड़कन महसूस होना या इमेज में असामान्य खून की नसों के संकेत स्पेशलिस्ट जांच मांगते हैं। ऐसे हिस्से का नमूना लेने से गंभीर खून बह सकता है।

  • ओरल रेडियोलॉजी: इमेज समझना, संभावित बीमारी को ज्यादा स्पष्ट करना और उपयुक्त अगली इमेजिंग की सलाह देना।
  • ओरल मेडिसिन: मुंह की अंदरूनी परत की बीमारी, बिना स्पष्ट वजह के लक्षण और मुंह पर असर डालने वाली शरीर की बीमारियों का आकलन।
  • ओरल और मैक्सिलोफेशियल सर्जरी: जबड़े की समस्याओं का आकलन, प्लान करके टिश्यू का नमूना लेना, फ्रैक्चर और सर्जरी की देखभाल।
  • सिर-गर्दन की कैंसर टीम: कैंसर का शक होने या पुष्टि होने पर मिलकर जांच और ट्रीटमेंट करना।
  • संबंधित डेंटल स्पेशलिस्ट: दांत से जुड़ी वजह की पुष्टि के बाद दांत बचाने, गम्स के ट्रीटमेंट या दांत की बनावट और काम ठीक करने की देखभाल।
  • निगरानी, सर्जरी या कई स्पेशलिस्ट की संयुक्त देखभाल बीमारी की पहचान के अनुसार होनी चाहिए, सिर्फ एक्स-रे में दिए नाम के आधार पर नहीं।

रेफरल और स्पेशलिस्ट रिपोर्ट में क्या लिखें?

जांच के लिए अच्छी क्वालिटी वाली मूल इमेज भेजें। सिर्फ कटा हुआ स्क्रीनशॉट या मैसेजिंग ऐप पर कम क्वालिटी हुई फोटो न भेजें। पूरा दिखाई देने वाला हिस्सा और उपलब्ध पुरानी इमेज भी दें। दूर से बनाई गई रिपोर्ट भेजी गई जानकारी तक सीमित होती है। उससे छूकर महसूस होने वाली गांठ या अल्सर की सीधे जांच नहीं हो सकती।

उपयोगी रिपोर्ट में जो दिखा है और उसका क्या मतलब हो सकता है, इन्हें अलग रखा जाता है। उसमें सीमाएं, कारणों के आधार पर निष्कर्ष और ऐसा अगला कदम होना चाहिए जिस पर अमल किया जा सके। गंभीर बदलाव मिले तो लिखित रिपोर्ट के साथ सीधे बात भी की जानी चाहिए।

  • रेफरल: मरीज की पहचान की जानकारी, उम्र, जांच की तारीख और स्पष्ट सवाल।
  • मरीज की स्थिति: लक्षण कितने समय से हैं, कैसे बढ़े, चेकअप में क्या मिला, जरूरी इतिहास और कौन सी प्रक्रिया तय है।
  • असामान्य हिस्से का विवरण: जगह, लगभग कितना फैला है, सीमा, अंदर की बनावट और पास के हिस्सों पर असर।
  • निष्कर्ष: सबसे संभावित वजह, दूसरी संबंधित संभावनाएं और कितनी अनिश्चितता है।
  • अगला कदम: सीधे चेकअप, तुलना, आगे की इमेजिंग, बायोप्सी के आकलन या रेफरल में से क्या चाहिए।
  • आगे की जिम्मेदारी: कौन मरीज से संपर्क करेगा, अगली देखभाल की व्यवस्था करेगा और पुष्टि करेगा कि रेफरल पूरा हुआ।

इन फैसलों के लिए गाइडलाइन क्या कहती हैं?

इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी की ‘रेडिएशन प्रोटेक्शन इन डेंटल रेडियोलॉजी’ जांच की जरूरत साबित करने और उसे सही तरीके से करने का समर्थन करती है। आसान शब्दों में, एक्स-रे का मरीज की देखभाल से जुड़ा मकसद होना चाहिए। गैरजरूरी रेडिएशन से बचते हुए पर्याप्त जानकारी मिलनी चाहिए।

पब्लिक हेल्थ इंग्लैंड और फैकल्टी ऑफ जनरल डेंटल प्रैक्टिस (यूके) की ‘गाइडेंस नोट्स फॉर डेंटल प्रैक्टिशनर्स ऑन द सेफ यूज ऑफ एक्स-रे इक्विपमेंट’ प्रशिक्षित स्टाफ, इमेज क्वालिटी की जांच और दर्ज किए गए क्लिनिकल आकलन का समर्थन करती है। यह यूके की गाइडलाइन है, भारत के कानूनी नियमों का बयान नहीं।

यूरोपियन कमीशन की ‘रेडिएशन प्रोटेक्शन नंबर 172, कोन बीम सीटी फॉर डेंटल एंड मैक्सिलोफेशियल रेडियोलॉजी: एविडेंस-बेस्ड गाइडलाइन्स’ जरूरत के अनुसार सीबीसीटी चुनने और रिकॉर्ड किए गए पूरे डेटा को जांचने का समर्थन करती है। सीबीसीटी की इन सलाहों को ऐसा नियम न बताएं कि हर पैनोरमिक इमेज की स्पेशलिस्ट रिपोर्ट जरूरी है।

ये स्रोत मिलकर ट्रेनिंग और क्षमता के आधार पर काम करने का समर्थन करते हैं: जांच की जरूरत तय करें, दिख रही पूरी बनावट देखें, व्याख्या दर्ज करें और जरूरत पर स्पेशलिस्ट की मदद लें। इन सिद्धांतों के साथ मौजूदा भारतीय नियम, संस्थान की नीतियां और संबंधित स्पेशलिटी की गाइडलाइन भी लागू करें।

मुंबई और आसपास के डॉक्टर मरीज को कहां रेफर कर सकते हैं?

गैर-इमरजेंसी ओरल मेडिसिन और रेडियोलॉजी आकलन के लिए डॉक्टर, डॉ. बिपिन आर. उपाध्याय, एमडीएस इन ओरल मेडिसिन एंड रेडियोलॉजी, से संपर्क कर सकते हैं। वे स्पेशल डेंटल ओपीडी, के.जे. सोमैया सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, सायन, मुंबई और रीजनेबल स्माइल डेंटल क्लिनिक, अंबरनाथ में प्रैक्टिस करते हैं। मरीज भेजने से पहले सही अपॉइंटमेंट और इमेज भेजने की व्यवस्था की पुष्टि करें।

ठाणे, बदलापुर या उल्हासनगर से रेफरल भेजते समय पहले जांच का सवाल और उसकी जल्दी बताएं। गांठ, अल्सर, संवेदना में बदलाव या निगलने में दिक्कत हो तो सिर्फ इमेज की रिपोर्ट न मांगें। सामने बैठकर जांच की व्यवस्था करें।

इमरजेंसी लक्षणों वाले मरीज को अस्पताल की इमरजेंसी व्यवस्था में भेजना चाहिए। कैंसर या तेजी से नुकसान करने वाली जबड़े की समस्या के शक में सीधे ओरल और मैक्सिलोफेशियल सर्जरी या सिर-गर्दन की कैंसर टीम को रेफर करना पड़ सकता है। ओरल रेडियोलॉजी इस आकलन में मदद कर सकती है।

Questions people ask

क्या भारत में कानून के अनुसार हर ओपीजी की ओरल रेडियोलॉजिस्ट रिपोर्ट जरूरी है?

अलग स्पेशलिस्ट रिपोर्ट के लिए पूरे भारत में एक ही नियम लागू है, ऐसा न मानें। हर जांच का सही आकलन और लिखित रिकॉर्ड जरूरी है। लागू भारतीय नियम और संस्थान की नीति जांचें। इमेज में दिख रहे बदलाव इलाज करने वाले डॉक्टर की क्षमता से बाहर हों तो स्पेशलिस्ट से रिपोर्ट लें।

क्या डेंटिस्ट सामान्य पैनोरमिक एक्स-रे समझ सकता है?

हां, अपनी ट्रेनिंग, क्षमता और लागू नियमों के दायरे में। पूरी दिखाई देने वाली इमेज देखनी चाहिए और उसकी व्याख्या दर्ज होनी चाहिए। ऐसी अस्पष्टता जो देखभाल बदल सकती हो, स्पेशलिस्ट रिपोर्ट लेने की वजह है।

क्या सामान्य ओपीजी से मुंह का कैंसर नकार सकते हैं?

नहीं। मुंह की अंदरूनी परत के शुरुआती कैंसर में हड्डी के बदलाव दिखाई न दें। दो हफ्ते से ज्यादा न भरने वाला अल्सर, गांठ, सुन्नपन, बिना स्पष्ट वजह खून आना या मुंह खोलने अथवा निगलने में दिक्कत की सामने बैठकर जांच जरूरी है।

क्या संयोग से दिखे हर गहरे हिस्से की बायोप्सी चाहिए?

नहीं। सामान्य बनावट और गैर-कैंसर वाली स्थितियां भी ओपीजी पर गहरी दिख सकती हैं। चेकअप, तुलना और स्पेशलिस्ट की राय से तय होता है कि निगरानी, आगे की इमेजिंग या बायोप्सी का आकलन सही रहेगा।

जबड़े का अस्पष्ट बदलाव रेफर करने से पहले सीबीसीटी कराना चाहिए?

अपने-आप नहीं। मूल ओपीजी और चेकअप की जानकारी के साथ रेफर करें। स्पेशलिस्ट तय कर सकता है कि सवाल का जवाब सीबीसीटी, अस्पताल की इमेजिंग, छोटे हिस्से के डेंटल एक्स-रे से मिलेगा या किसी अतिरिक्त इमेजिंग की जरूरत ही नहीं है।

क्या ओरल रेडियोलॉजिस्ट दूर से पैनोरमिक इमेज की रिपोर्ट दे सकता है?

अच्छी इमेज और मरीज की पर्याप्त जानकारी उपलब्ध हो तो दूर से इमेज की व्याख्या की जा सकती है। यह अल्सर, सूजन, संवेदना में बदलाव या किसी दूसरे शारीरिक बदलाव की सामने बैठकर जांच की जगह नहीं ले सकती।

अस्पष्ट बदलाव की जांच चल रही हो तो क्या तय किया हुआ दांत निकाल सकते हैं?

अगर उस बदलाव से बीमारी की पहचान या प्रक्रिया की सुरक्षा प्रभावित हो सकती है, तो स्पष्टता आने तक गैर-इमरजेंसी प्रक्रिया टालें। तुरंत देखभाल मांगने वाली दांत की समस्याओं में डॉक्टरों को मिलकर फैसला लेना चाहिए, सिर्फ रूटीन रिपोर्ट का इंतजार नहीं करना चाहिए।

अनपेक्षित बदलाव मिलने पर कदम उठाने की जिम्मेदारी किसकी है?

देखभाल करने वाली टीम में जिम्मेदारी साफ तय होनी चाहिए। रिपोर्ट देने वाले डॉक्टर को गंभीर अनपेक्षित बदलाव सीधे बताने चाहिए। रेफर करने वाले डॉक्टर को रिपोर्ट मिलने और पढ़ने की पुष्टि करनी चाहिए, मरीज को बताना चाहिए और सही फॉलो-अप सुनिश्चित करना चाहिए।

This page is general information, not a diagnosis. A mouth problem needs to be looked at in person or on video before anyone can tell you what it is.